‘राजसी’ तलाकः जयपुर की पूर्व राजकुमारी दीया और नरेंद्र सिंह का आपसी सहमति से तलाक

जयपुर। पूर्व राजपरिवार की सदस्य और विधायक रहीं दीया कुमारी और उनके पति नरेंद्र सिंह के बीच आपसी सहमति से तलाक हो गया। दोनों की शादी 24 साल पहले हुई थी। दोनों डेढ़ साल से अलग रह रहे थे। फेमिली कोर्ट से तलाक मंजूर हो गया है। दोनों बच्चे दीया के साथ रहेंगे। फैमिली कोर्ट के इस आदेश की कॉपी मंगलवार को जारी हुई।

दीया और नरेंद्र के तीन संतान हैं। उनके बड़े बेटे पद्मनाभ सिंह को महाराज भवानी सिंह ने गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया हुआ है। दूसरे बेटे लक्ष्यराज व एक बेटी गौरवी है। दोनों ने 7 दिसंबर 2018 को तलाक का आवेदन दिया था। प्रार्थना पत्र में दीया ने अवयस्क बच्चों को अपने साथ रखने की इच्छा जताई थी, ऐसे में माना जा रहा है कि वे दीया के साथ ही रहेंगे।

दीया पूर्व महाराज सवाई भवानी सिंह व पद्मिनी की बेटी हैं। उन्होंने अपनी पढ़ाई जयपुर, दिल्ली और लंदन में की है। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट से सवाई मादोपुर से चुनाव लड़ा और विधायक चुनी गईं। वहीं उनके पति नरेंद्र सिंह शिवाड़ कोठड़ा ठिकाने से हैं। दोनों ने प्रेम विवाह किया था और यह काफी चर्चाओं में रहा था।

काफी मशहूर रही है प्रेम कहानी
दीया कुमारी अपने प्रेम विवाह को परियों की कहानी से कम नहीं मानती थीं। जयपुर में अपने कॉमन फ्रेंड के घर पर छिप-छिप कर मिलने वाली दीया और नरेंद्र की दोस्ती और प्रेम का रिश्ता काफी उतार चढ़ाव वाला रहा है।

जयपुर के गांधी नगर की फैमिली कोर्ट में दीया और नरेंद्र ने 6 सितंबर को तलाक की अर्जी लगाई थी। मात्र 36 दिन में कोर्ट ने उनका तलाक मंगलवार को मंजूर कर लिया।

विरोध के बीच प्रेम विवाह को लेकर दीया के विभिन्न मीडिया को दिए साक्षात्कार से भी पता चलता है कि प्यार और शादी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी।

पहली बार म्यूजियम ट्रस्ट में मिले थे
“जब मैं 18 साल की थी, तब पहली बार शिवाड़ के कोठड़ा ठिकाने के नरेंद्र सिंह राजावत से मिली। वो न तो मेरे कैशियर थे और न ही एडीसी या शोफर, जैसा मीडिया में छपता रहा। वो सीए हैं जिनका खुद का कंस्ट्रक्शन बिजनेस था। हम पहली बार 1989 में मिले जब मेरे पिता को राजीव गांधी ने जयपुर से चुनाव लड़ने के लिए कहा था नरेंद्र सिंह के पिता ठा. बुध सिंह सवाई माधोपुर ठिकाने से हैं। उन्होंने पिता के चुनाव प्रचार में मदद की थी। उसी दौरान नरेंद्र जो बी.कॉम करने के बाद चार्टर्ड एकाउंटेंसी की पढ़ाई कर रहे थे, ने प्रैक्टिस के लिए एसएमएस म्यूजियम ट्रस्ट जॉइन किया था। तभी उनसे मुलाकात हुई। मैं भी अकाउंट्स के काम से उनसे पैलेस में मिली और उनसे बातें कर बहुत अच्छा लगा। उनकी सादगी और केयरिंग नेचर दिल को छू गया। हालांकि यह पहली नजर में प्यार जैसा नहीं था। तीन महीने बाद जब वो वहां से गए तब लगा कि उनसे फिर मिलना चाहिए। ऐसे हम दोस्त बने। जब भी वो जयपुर आते हम एक कॉमन फ्रेंड के यहां मिलते। जब मैं अभिभावकों के साथ विदेश यात्रा पर गई तब पहली बार लगा कि मैं उनके बिना रह ही नहीं सकती। तब अहसास हुआ कि ये भावनाएं दोस्ती से कुछ ज्यादा थी। मां को यह बात बताई तो वो सकते में आ गई। वो चाहती थीं कि हमारे जैसे शाही परिवार में मेरी शादी हो। उन्हें यकीन था मैं इन बातों से बाहर आ जाऊंगी इसलिए पिता को नहीं बताया। उसके बाद हम जयपुर से बाहर दिल्ली में मिलने लगे। नरेंद्र के अभिभावकों को भी जब इस रिश्ते की खबर हुई तो वे भी नाराज हुए।”

1994 में आर्य समाज में शादी
उन्होंने बताया कि इकलौती बेटी थी, इसलिए मां को दुखी देखकर मैं खुद को कसूरवार मानने लगी और 5-6 महीनों तक नरेंद्र से दूरी बना ली। वो वक्त मेरी जिंदगी का सबसे बुरा दौर था। मैं उनकी आवाज सुनने के लिए ब्लैंक कॉल्स भी करती थी लेकिन एक दिन फोन पर बात कर ली। पेरेंट्स को बिना बताए शादी कर ली। क्योंकि, वो अब भी सोच रहे थे कि मैं इससे बाहर निकल आऊंगी। 6 सालों के साथ के बाद 1994 में आर्य समाज में शादी कर ली। फिर कोर्ट में रजिस्ट्रेशन करवाया। यह सोचकर कि बाद में अभिभावकों को बता देंगे, लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ बता पाती, ब्रुनई में हाई कमिश्नर की पोस्टिंग पर तैनात पिता को स्ट्रोक आ गया। मां और मुझे उन्हें लेकर इलाज के लिए सिंगापुर जाना पड़ा। जब वो ठीक होकर भारत लौटे तो मैंने दोनों को अपने फैसले के बारे में बता दिया। लेकिन, दो सालों तक यह नहीं बताया कि हमारी शादी हो चुकी है। नवंबर 1996 में आखिर मां को बता दिया और नरेन्द्र ने अपने अभिभावकों को। उनके पिता मेरे पिता को जानते थे, इसलिए नरेंद्र से इस बात के लिए नाराज हो गए। 1997 में मां ने पिता को इस बारे में बताया, जिससे वे काफी नाराज हुए, लेकिन फिर मेरे नजरिए को समझकर रिश्ते को अपना लिया।

कहते थे-इस्लाम कबूल कर लो
दीया कुमार ने बताया- सार्वजनिक तौर पर अगस्त 1997 में हमारा विवाह और रिसेप्शन हुआ। विवाह की घोषणा के बाद से ही धमकियों का सिलसिला शुरू हो गया। किडनैपिंग और सुसाइड स्क्वाड भेजने की धमकियां भी मिलीं। राजपूत समाज में भी अंतरजातीय विवाह और सगोत्र शादियां होती रही हैं फिर भी समाज के ठेकेदारों को हमारी शादी से एतराज था।

मां के आगे शर्त रखी गई कि यह शादी हुई तो इस्लाम अपनाना होगा। वहीं 2015 में एक दूसरी मैगजीन को दिए इंटरव्यू में दीया ने बताया था कि सभी रिश्तेदारों को लगता था कि मेरी शादी किसी महाराजा से होगी लेकिन मैं सिर्फ अच्छे इंसान से शादी करना चाहती थी, पद से नहीं।

बेटी के लिए पिता ने छोड़ा राजपूत सभा का पद 

“कहा जाता है कि दीया की इसी पसंद की वजह से ब्रिगेडियर भवानी सिंह ने राजपूत सभा के अध्यक्ष का पद छोड़ दिया था और समाज से दूरी बना ली थी क्योंकि राजपूत समाज दीया के इस कदम से नाराज था। 2008 में दीया कुमारी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनकी परवरिश दूसरी राजकुमारियों जैसी नहीं हुई बल्कि एक आम भावनात्मक इंसान की तरह हुई। शादी का मुद्दा निजी है और उससे किसी दूसरे को फर्क नहीं पड़ना चाहिए। न ही मैं समाज की धमकियों से डरी और न ही कमजोर पड़ी। मैं सिर्फ 16 साल की थी जब एक शाही परिवार से रिश्ता आया लेकिन मेरे माता-पिता ने यह कहकर मना कर दिया कि मैं मंगनी के लिए छोटी हूं।”

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