विश्व स्तर पर संगमनगरी ने बढ़ाया है हिंदी का मान

दुनिया में हिंदी का मान बढ़ रहा है। गांव की गलियों से विश्व मंच तक हिंदी छाई है। विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी को विश्व भाषा बनाने की मांग उठ रही है। हिंदी को वैश्विक पहचान देने में संगमनगरी का बड़ा योगदान रहा है। शहर की साहित्यिक संस्थाओं और साहित्यकारों ने दुनिया में हिंदी की हमेशा से अलख जगाई है। इनमें महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, राजर्षि पुरुषोतम दास टंडन, महाप्राण निराला, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, बालकृष्ण भट्ट, डॉ. धर्मवीर भारती, डॉ. हरिवंश राय बच्चन, डॉ. राम कुमार वर्मा, अमरकांत, उपेन्द्रनाथ अश्क़, गोपीकृष्ण गोपेश जैसी विभूतियों ने विश्व स्तर पर हिंदी को समृद्ध किया है।

विश्व हिंदी सम्मेलन में जगाई हिंदी की अलख

पूर्व राज्यपाल पं. केशरी नाथ त्रिपाठी ने विश्व हिंदी सम्मेलन का नेतृत्व किया। उन्होंने बताया कि हमेशा से इंग्लैंड, अमेरिका, मॉरीशस और आयरलैंड में हिंदी लोकप्रिय रही है। हिंदी में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है। लोग व्यवहार में हिंदी का प्रयोग कर रहे हैं। साहित्य संगम के आलोक चतुर्वेदी ने बताया कि 2018 में मॉरीशस में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लिया था।

साहित्यिक संस्थाओं, साहित्यकारों ने जगाई हिंदी की अलख

साहित्यकार रविनंदन सिंह ने बताया कि दुनिया में हिंदी का मान बढ़ाने में हिंदी साहित्य सम्मेलन, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, विज्ञान परिषद और अखिल भारतीय हिन्दी परिषद की महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं। हिंदी के विद्वान भाषा विज्ञानी डॉ. भोलानाथ तिवारी, डॉ. उदय नारायण तिवारी, डॉ. हरदेव बाहरी और डॉ. धीरेन्द्र वर्मा ने हिंदी का मान दुनिया में बढ़ाया। अमेरिका से प्रकाशित पत्रिका कृष्ण काव्य पीयूष में डॉ. विजयानन्द की कविता प्रकाशित हुई है।

25 देशों को भेजी जाती है विज्ञान पत्रिका

विज्ञान परिषद से जुड़े देवव्रत द्विवेदी ने बताया कि विज्ञान परिषद की विज्ञान अनुसंधान पत्रिका दुनिया के 25 देशों को भेजी जाती है। इसके बदले में उस देश की पत्रिका मंगाई जाती है। हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमंत्री विभूति मिश्र ने बताया कि सम्मेलन की मॉरीशस में शाखा संचालित है।

अफगानिस्तान के नासेरी कर रहे एमए

इविवि हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रो. कुमार वीरेंद्र ने बताया कि अफगानिस्तान के मलिक मोहम्मद नासेरी हिंदी से एमए कर रहे हैं। विदेशी छात्र भी हिंदी को काफी पसंद कर रहे हैं।

याशमीन सुल्ताना नकवी ने जापान में जगाई अलख

साहित्यकार डॉ. याशमीन सुल्ताना नकवी ने पांच वर्षों तक जापान में हिंदी की अलख जगाई। उन्होंने 2005 से 2010 तक जापान के ओसाका विश्वविद्यालय में लगभग 520 छात्रों और छह शोधार्थियों को हिंदी पढ़ाई। साथ ही विश्व स्तर पर हिंदी के प्रचार प्रसार का कार्य किया।

लक्ष्मीधर ने दुनिया में फैलाया हिंदी का प्रकाश

पंडित मदन मोहन मालवीय के पौत्र साहित्यकार डॉ. लक्ष्मीधर मालवीय पांच दशक तक जापान में हिंदी साहित्य के दूत बनकर रहे। वह 1966 में ओसाका विश्वविद्यालय जापान में अध्यापन के लिए चले गए थे। वहां क्योटो विश्वविद्यालय में सात वर्षों तक तुलनात्मक संस्कृति पढ़ाया था। 2019 में मालवीय का निधन हो गया।

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