अयोध्या विवाद : ये हैं राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद के 10 प्रमुख चेहरे

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चैतन्य भारत न्यूज

नई दिल्ली. भारत के बहु-प्रतीक्षित राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद का फैसला जल्द ही आने वाला है। अक्टूबर में आयोध्या विवाद कुछ ज्यादा ही चर्चा में रहा। दरअसल 5 सदी पुराने इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में 16 अक्टूबर को सुनवाई खत्म हुई। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई ने अयोध्या भूमि विवाद पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। बता दें 17 नवंबर को गोगोई अपने पद से रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि रिटायर होने से पहले वह इस मुद्दे पर अपना फैसला सुना सकते हैं।



वैसे अयोध्या विवाद कई मायनों में खास है। यह देश का दूसरा ऐसा मामला है, जिसकी सुप्रीम कोर्ट में 40 दिन से ज्यादा सुनवाई चली। बता दें अयोध्या विवाद की सुनवाई 6 अगस्त से रोजाना सुप्रीम कोर्ट में चल रही है जो कि 16 अक्टूबर को पूरी हुई। अयोध्या विवाद से पहले केशवनंद भारती का केस सुप्रीम कोर्ट में सबसे ज्यादा 68 दिन तक लगातार चला था। बता दें अयोध्या विवाद में सबसे अहम मोड़ तब आया जब 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के ढांचे को ढहा दिया गया था। इसके बाद देशभर में हिंसा भड़क गई थी जिसमें दो हजार से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गवां दी थी। उसके बाद से अब तक यह मुद्दा ज्वलंत बना हुआ है। यदि इस विवाद को गहराई से देखें तो इसमें 10 ऐसे प्रमुख चेहरे हैं जो अयोध्या विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा में रहे हैं। आइए जानते हैं कौन-कौनसे हैं वो 10 चेहरे जिन्होंने इस विवाद की दशा-दिशा तय की है-

जवाहरलाल नेहरू

इस विवाद में सबसे पहला नाम देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आता है। 23 दिसंबर 1949 में जब मस्जिद में भगवान राम की मूर्तियां मिली थी तो देशभर में तनाव फैल गया था। इसके बाद पीएम नेहरू ने उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री जीबी पंत को कड़े कदम उठाने का आदेश दिया था। सरकार ने मूर्तियां हटाने का आदेश तो दे दिया लेकिन तत्कालीन डीएम (जिला अधिकारी) ने दंगे भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने से मना कर दिया। उस समय नेहरू अयोध्या भी आना चाहते थे लेकिन डीएम ने सुरक्षा का हवाला देते हुए उन्हें रोक दिया था।

रामचंद्र परमहंस

रामचंद्र परमहंस ने 5 दिसंबर 1950 को विवादित स्थान पर पूजा करने के लिए जिला कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। वह रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष भी बने। 1934 से ही रामचंद्र परमहंस राममंदिर विवाद से जुड़ गए थे। उन्होंने साल 2003 में अयोध्या में ही अंतिम सांस ली। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी उनके अंतिम संस्कार में पहुंचे थे।

हाशिम अंसारी

23 जनवरी 1949 में मूर्तियां रखे जाने की घटना अयोध्या कोतवाली में दर्ज हुई। उस समय अंसारी गवाह के रूप में सबसे पहले आगे आए थे। 18 दिसंबर 1961 को दूसरा केस हाशिम अंसारी, हाजी फेंकू समेत 9 मुस्लिमों के द्वारा मालिकाना हक के लिए फैजाबाद के सिविल कोर्ट में लगाया गया था।

अशोक सिंघल

अगर किसी को राम मंदिर आंदोलन का चीफ आर्किटेक्ट कहा जा सकता है तो वे दिवंगत वीएचपी अध्यक्ष अशोक सिंघल थे। 1984 में हुई धर्मसंसद में अशोक सिंघल ने मुख्य भूमिका निभाई थी। यहीं से राम जन्मभूमि आंदोलन की नींव पड़ी थी। 20 नवंबर 1992 को वे शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे से मिले और उन्हें कारसेवा में हिस्सा लेने का न्योता दिया और 4 दिसंबर 1992 को बाल ठाकरे ने शिवसैनिकों को अयोध्या जाने का आदेश दिया। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के मुख्य किरदारों में सिंघल का नाम भी शामिल था। सीबीआई की चार्जशीट में अशोक सिंघल पर आरोप है कि वे 6 दिसंबर को राम कथा कुंज पर बने मंच से नारा लगवा रहे थे कि ‘राम लला हम आए हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे। एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो।’ 17 नवंबर 2015 में उनका निधन हो गया था।

राजीव गांधी

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ही साल 1986 में बाबरी मस्जिद परिसर का ताला खोलने का आदेश दिया था और फिर सारा विवाद नए सिरे से शुरू हो गया। 1989 में चुनाव से पहले बोफोर्स घोटाले में लगातार नए-नए खुलासे हो रहे थे। विपक्ष राजीव गांधी पर लगातार हमला कर रहा था। वह यह बिलकुल नहीं चाहते थे कि शाहबानों प्रकरण की वजह से उनकी छवि हिंदू विरोधी बने। इसलिए उन्होंने अयोध्या में शिलान्यास भी होने दिया।

मुलायम सिंह यादव

साल 1990 में अयोध्या में आंदोलन परवान चढ़ गया था। अयोध्या में कर्फ्यू लग गया था। 30 अक्टूबर 1990 को कारसेवकों पर गोली चली जिसमें पांच लोगों की जान चली गई। जिससे कारसेवक आक्रोशित हो गए। 2 नवंबर 1990 को कारसेवक हनुमान गढ़ी के पास पहुंचे। उस समय पुलिस ने गोलियां चलाईं। तब मुलायम सिंह यादव ही मुख्यमंत्री थे। उस समय से ही मुलायम सिंह को ‘मुल्ला मुलायम’ कहने लगे।

लाल कृष्णा अडवाणी

सितंबर 1990 में अडवाणी ने ही गुजरात के सोमनाथ मंदिर से 10 हजार किलोमीटर लंबी रथयात्रा शुरू की थी जिसने देशभर में राममंदिर आंदोलन को लेकर एक नई दिशा दिखाई। 6 दिसंबर 1992 को इसका असर दिखाई दिया था जब मस्जिद का ढांचा ढहाया गया था। सीबीआई ने चार्जशीट में लालकृष्ण अडवाणी को भी बाबरी मस्जिद विध्वंस का मुख्य सूत्रधार माना है।

कल्याण सिंह

कल्याण सिंह मस्जिद गिराए जाने के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। कल्याण सिंह का नाम भी सीबीआई की चार्जशीट में 13 आरोपियों लिस्ट में था। उन पर आरोप है कि, मुख्यमंत्री होने के बावजूद कल्याण सिंह और भी कई नेताओं के साथ अयोध्या पहुंचे और मंदिर बनाने की शपथ ली। साथ ही उनपर यह भी आरोप है कि, उन्होंने उग्र कारसेवकों को उनकी पुलिस और प्रशासन ने जानबूझकर नहीं रोका।

नृत्य गोपाल दास

रामचंद्र परमहंस के निधन के बाद नृत्य गोपाल दास को ही रामजन्मभूमि न्यास का अध्यक्ष बनाया था। वैसे तो नृत्य गोपाल दास की गिनती शांत स्वभाव वाले संतों में की जाती है लेकिन राम मंदिर की सबसे मुखर आवाज भी यही बने हैं। फिलहाल नृत्य गोपाल दास मणिराम छावनी के भी महंत हैं। साथ ही वह अयोध्या-मथुरा के मंदिरों के न्यास के भी अध्यक्ष हैं। नृत्य गोपाल दास इस समय मंदिर आंदोलन के प्रमुख संतों में शामिल हैं।

पीवी नरसिम्हा राव

जब बाबरी का ढांचा गिराया गया तब पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे। घटना के समय वह पूजा में बैठे थे। जानकारी के मुताबिक, घटना के बाद उनके मंत्रिमंडल के सदस्य अर्जुन सिंह ने पंजाब से उनसे फोन पर बात करने की कोशिश की, लेकिन राव ने बात करने से मना कर दिया था। बाद में इस घटना का जिम्मेदार नरसिम्हा राव को ठहराया गया था। इसका खामियाजा उन्हें और उनकी पार्टी को कई चुनावों में भुगतना पड़ा। कांग्रेस ने न सिर्फ उनसे किनारा कर लिया, बल्कि घटना का पूरा ठीकरा भी उन्हीं के सिर फोड़ने की कोशिश की।

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