आदिशंकराचार्य जयंती: जगद्गुरु शंकराचार्य जिन्होंने हिंदू धर्म को दी एक नई चेतना, 8 वर्ष की उम्र में ले लिया था संन्यास

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चैतन्य भारत न्यूज

वैशाख शुक्ल पंचमी बेहद भाग्यशाली तिथि है। इसी दिन हिंदू धर्म की ध्वजा को देश के चारों कौनों तक पहुंचाने वाले, अद्वैत वेदांत के मत को शास्त्रार्थ द्वारा देश के हर कौने में सिद्ध करने वाले, भगवान शिव के अवतार माने जाने वाले आदि शंकराचार्य ने जन्म लिया था। आदि गुरु शंकराचार्य के जन्म दिवस को आदि शंकराचार्य जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस बार वैशाख शुक्ल पंचमी अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार वर्ष 2020 में 28 अप्रैल को है। शंकाराचार्य जयंती के अवसर पर आइए जानते हैं आदि शंकराचार्य के जीवन से जुड़ी खास बातों के बारे में।

8 वर्ष की उम्र में लिया संन्यास

गुरु शंकराचार्य भारतीय गुरु और दार्शनिक थे, उनका जन्म आठवीं सदी में भारत के दक्षिणी राज्य केरल के कालपी नामक स्थान पर हुआ था। आदि शंकराचार्य को भगवान शिव अवतार के रूप मे माना जाता है। शंकराचार्य के पिता की मत्यु उनके बचपन में ही हो गई थी। बचपन से ही शंकराचार्य का रुझान संन्यासी जीवन की तरफ था। लेकिन उनके मां नहीं चाहती थीं कि वो संन्यासी जीवन अपनाएं। 8 साल की उम्र में जब एक बार शंकराचार्य अपनी मां शिवतारका के साथ नदी में स्नान करने गए थे तो वहां उन्हें मगरमच्छ ने पकड़ लिया था। इसके बाद शंकराचार्य ने अपनी मां से कहा कि, ‘वो उन्हें संन्यासी बनने की अनुमति दे दे वरना ये मगरमच्छ उन्हें मार देंगे। जिसके बाद उनकी मां ने उन्हें संन्यासी बनने की अनुमति दे दी।’ फिर उन्होंने आठ वर्ष की उम्र में इन्होंने संन्यास ग्रहण किया था।

100 से ज्यादा ग्रंथों की रचना की

शंकराचार्य ने अपनी माता की आज्ञा से वैराग्य का रास्ता अपनाया और सत्य की खोज में चल पड़े। मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें वेदों का संपूर्ण ज्ञान हो गया था। बारह वर्ष की आयु तक आते-आते वे शास्त्रों के ज्ञाता हो चुके थे। सोलह वर्ष की अवस्था में तो आप ब्रह्मसूत्र भाष्य सहित 100 से भी अधिक ग्रंथों की रचना कर चुके थे। इसी कारण आपको आदि गुरु शंकाराचार्य के रूप में भी प्रसिद्धि मिली।

अल्प आयु में हो गया था निधन

शंकराचार्य का निधन 32 साल की उम्र में उत्तराखंड के केदारनाथ में हुआ था। लेकिन इससे पहले उन्होंने हिंदू धर्म से जुड़ी कई रूढि़वादी विचारधाराओं से लेकर बौद्ध और जैन दर्शन को लेकर कई चर्चा की हैं। शंकराचार्य हिन्दू धर्म में सर्वोच्च धर्म गुरु का पद है। यह पद बौद्ध धर्म में दलाईलामा एवं ईसाई धर्म में पोप के बराबर समझा जाता है। इस पद की परम्परा आदि गुरु शंकराचार्य ने ही शुरू की थी।

चार मठों की स्थापना की

शंकराचार्य ने सनातन धर्म के प्रचार और प्रतिष्ठा के लिए भारत के 4 क्षेत्रों में चार मठ स्थापित किए। उन्होंने अपने नाम वाले इस शंकराचार्य पद पर अपने चार मुख्य शिष्यों को बैठाया। जिसेक बाद इन चारों मठों में शंकराचार्य पद को निभाने की शुरुआत हुई। 4 दिशाओं में स्थित ये मठ हिंदू धर्म के सबसे पवित्र एवं प्रामाणिक संस्थान माने जाते हैं। इनका नाम है-

  1. ज्योतिर्मठ, बद्रीनाथ
  2. वेदान्त ज्ञानमठ अथवा श्रृंगेरी पीठ, कर्नाटक
  3. शारदा मठ, द्वारिका
  4. गोवर्धन मठ, जगन्नाथ धाम

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