देश की इकलौती घुड़सवार सेना में होगा बदलाव, अब घोड़ों की जगह होगा टैंकों का उपयोग

चैतन्य भारत न्यूज

भारतीय सेना की 61वीं कैवलरी (61st Cavalry) और उसके घोड़े अबतक आर्मी की शान बढ़ाते आए हैं। दुनिया में यह इकलौती घुड़सवार सेना है। चाहे विजय पथ से राजपथ तक गणतंत्र दिवस की परेड का आगाज हो या फिर सेना दिवस परेड की अगवानी… भारत की यह घुड़सवार सेना में घोड़ों की टाप हर भारतीय के जहन में अनमोल विरासत के तौर पर दर्ज है। लेकिन अब इसमें बदलाव की बात चल रही है।

कुछ लोग नाखुश

जानकारी के मुताबिक, इसमें घोड़ों को जगह टैंक लगाकर इसे नियमित आर्म्ड रेजीमेंट बनाने की तैयारी चल रही है। हाल ही में आर्मी चीफ जनरल एमएम नरवणे ने इस प्रस्ताव की जानकारी दी थी। लेकिन सेना के इस प्लान से इस युनिट के ही कुछ लोग नाखुश है। उनका मानना है कि यह एतिहासिक परंपरा को खत्म करने जैसा है।

2016 में दिया था प्रस्ताव

जानकारी के मुताबिक, 61वीं घुड़सवार इकाई को हटाने की वजह सेना की लड़ाकू क्षमता को बढ़ाना और अपने राजस्व व्यय को कम करना है। बता दें साल 2016 में सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल डीबी शेकाटकर के नेतृत्व में गठित कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर यह प्रस्ताव दिया गया है। शेकाटकर समिति के सिफारिश में इसे एक नियमित आर्म्ड रेजीमेंट में परिवर्तित करने की बात कही गई है। अब इस कैवलरी के 232 घाेड़ाें काे जयपुर से दिल्ली भेजा जाएगा, जिनका इस्तेमाल सिर्फ खास सेरेमाेनियल माैकाें पर हाेगा। ऐसे में सेना के पास प्रेजीडेंट्स बाॅडी गार्ड्स के रूप में सिर्फ एक घुड़सवार इकाई रह जाएगी।

61वीं कैवलरी की उपलब्धियां

पाेलाे और इक्वेस्ट्रियन स्पाेर्ट्स प्रमाेट करने के उद्देश्य से बनाई गई 61वीं कैवलरी ने खेलों में 11 अर्जुन अवाॅर्ड और 10 एशियन गेम्स अवाॅर्ड जीते हैं। 2011 और 2017 की वर्ल्ड पाेलाे चैम्पियनशिप में इन्होने पहला स्थान जीता था। 1971 के इंडाे-पाक युद्ध और 1961 के ऑपरेशन विजय में भी इन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी।

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