ये हैं वो 5 कारण जिसकी वजह से अयोध्या केस में खारिज हुआ मुस्लिम पक्ष का दावा!

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चैतन्य भारत न्यूज

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार शनिवार को अयोध्या मामले पर अपना फैसला सुना ही दिया। शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई में जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर वाली पांच जजों की पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए अयोध्या की विवादित जमीन पर कई अहम बातें कही हैं।



बता दें साल 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रामलला विराजमान और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के साथ निर्मोही अखाड़े को भी बराबर जमीन देने का फैसला सुनाया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित जमीन पर सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के साथ ही निर्मोही अखाड़े के दावे को खारिज कर दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि निर्मोही अखाड़े को सरकार ट्रस्ट में शामिल कर सकती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट ने आखिर किन वजहों से पक्ष का दावा खारिज किया? आइए जानते हैं इसकी वजहें-

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मस्जिद के ढांचे के नीचे से नहीं मिला इस्लामिक ढांचा

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील जितेंद्र मोहन शर्मा ने बताया कि, इस मामले में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने अपनी दलील में कहा कि, बाबर के शासनकाल में मंदिर को ढहाकर बाबरी मस्जिद नहीं बनाई गई थी, बल्कि ईदगाह की जगह पर बनाई गई थी। लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की साल 2003 की रिपोर्ट के मुताबिक, मस्जिद के नीचे से कोई इस्लामिक ढांचा नहीं मिला, जिससे साबित होता है कि मस्जिद ईदगाह पर नहीं बनाई गई। खुदाई के दौरान मस्जिद के नीचे से हिंदू धर्म से जुड़े सबूत मिले थे।

विवादित जमीन पर प्रतिकूल कब्जे का दावा खारिज

मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में एडवर्स पजेशन का दावा किया। यानी कि मुस्लिम पक्ष के पास विवादित जमीन का असली मालिकाना हक नहीं था, लेकिन उसने कब्जे के आधार पर मालिकाना हक का दावा किया था।
उनकी दलील थी कि, यदि हिंदू पक्ष की बात मान भी ली जाए कि मंदिर को ढहाकर मस्जिद बनाई गई, तो उस पर एडवर्स पजेशन का अधिकार बनता है। साल 1528 में वहां बाबर के शासनकाल में बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। उस पर सिर्फ मुस्लिमों का कब्जा रहा। इस दावे को सुप्रीम कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया।

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मुस्लिमों ने विवादित पूरी जमीन का नहीं किया इस्तेमाल

सूत्रों के मुताबिक, अयोध्या की पूरी विवादित जमीन का मुस्लिमों ने इस्तेमाल नहीं किया था। राम मंदिर के भीतरी अहाते में मस्जिद थी और बाहरी अहाते में हिंदू लगातार पूजा करते रहे। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि, मुस्लिमों का 2.77 एकड़ विवादित जमीन के पूरे हिस्से में कब्जा नहीं था। वह पूरी विवादित जमीन पर नमाज नहीं पढ़ते थे। जबकि हिंदू पक्षकार जमीन एक हिस्से में लगातार पूजा करते थे। कोर्ट ने यह माना कि, मंदिर के बाहरी अहाते में भगवान राम की पूजा होती रही। ऐसे में पूरे विवादित स्थल पर मुस्लिम पक्ष का दावा नहीं है। इसलिए यह जमीन रामलला विराजमान को दी जाती है। वरिष्ठ वकील विनय कुमार गर्ग ने बताया कि, यदि कोई किसी जमीन पर अपने कब्जे का दावा करता है और उसके एक हिस्से को इस्तेमाल करना छोड़ देता है, तो उसका अधिकार खत्म माना जाता है।

मस्जिद में 325 साल तक नमाज पढ़ने के सबूत नहीं

सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने कोर्ट में यह दावा किया था कि, अयोध्या की विवादित जमीन पर मुगल सम्राट बाबर के आदेश पर साल 1528 में बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। लेकिन मस्जिद बनाने की तारीख से 1856-57 यानी 325 साल से ज्यादा समय तक विवादित जमीन पर नमाज पढ़ने की बात साबित नहीं हुई। ऐसे में विवादित जमीन पर कब्जे को लेकर मुस्लिम पक्षकार के पास कोई ठोस सबूत भी थे।

ब्रिटिश काल में भी मुस्लिम पक्ष के दावे को नहीं मिली मंजूरी

कोर्ट ने यह भी पाया कि 1856-57 में सांप्रदायिक दंगे के बाद ब्रिटिश काल में ईंट की दीवार बनाई गई थी, जिससे कि हिंदू-मुस्लिम के बीच विवाद को रोका जा सके और शांति बनी रहे। फिर मंदिर के बाहरी अहाते में हिंदुओं को पूजा करने की इजाजत दे दी गई थी। जब अयोध्या की विवादित जमीन पर ईंट की दीवार बनाई गई, उस समय हिंदू और मुस्लिम में से किसी के मालिकाना हक की बात नहीं की गई। सिर्फ हिंदू और मुस्लिमों के बीच शांति बनाए रखने के लिए यह किया गया था।

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