भारत में घटी कामकाजी महिलाओं की संख्या, लेकिन स्वरोजगार की अपेक्षा नौकरी करने वाली महिलाएं 16% बढ़ी

चैतन्य भारत न्यूज

घरेलू जिम्मेदारी और बच्चों की परवरिश के लिए महिलाएं अपनी नौकरी छोड़ देती हैं। हालांकि, जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी कर रही महिलाओं की पहचान भी अब बदलने लगी है। लेकिन कुछ महिलाओं को जिम्मेदारियों के चलते कामकाज में अपनी भागीदारी कम करनी पड़ती है। हाल ही में एक रिपोर्ट आई है जिसके अनुसार भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या लगातार घट रही है।

स्वरोजगार के क्षेत्र में भी महिलाओं की हिस्सेदारी कम हुई है। जबकि शहरी क्षेत्रों में नौकरीपेशा महिलाओं की संख्या बढ़ी है। इस बात का खुलासा अजीम प्रेम जी यूनिवर्सिटी के शोध में हुआ है। शोधकर्ताओं ने मई में सरकार द्वारा जारी आंकड़ों का विश्लेषण किया है। इस शोध में पाया गया है कि, नौकरीपेशा यानी तनख्वाह पाने वाली महिलाओं की संख्या स्वरोजगार या सामान्य कामकाज करने वाली महिलाओं की तुलना में बढ़ी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में 18% महिलाएं ही स्वरोजगार से जुड़ी हैं, जबकि छह साल पहले इनकी संख्या 25% थी। इसके अलावा शहरों में कामकाजी महिलाओं की संख्या एक फीसदी गिरकर 14% हो गई है। लेकिन शहरी इलाकों में नौकरीपेशा महिलाओं की संख्या 2004 में 35.6% के मुकाबले 2017 में बढ़कर 52.1% हो गई है।

कामकाजी महिलाओं की घटी संख्या को लेकर कुछ कारण भी बताए गए हैं। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि, कुछ महिलाएं इसलिए अपना कामकाज छोड़ देती हैं क्योंकि उनके पति की आमदनी अच्छी रहती है। इसके अलावा ज्यादातर महिलाएं पति की आमदनी बढ़ने के बाद नौकरी छोड़ देती हैं। इसे इनकम इफेक्ट कहते हैं।

स्वरोजगार करने वाले पुरुषों की आमदनी महिलाओं से दुगनी

शोध में पता चला कि स्वयं का रोजगार करने वाले पुरुष महिलाओं से दोगुनी आमदनी पाते हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुष महिलाओं की अपेक्षा 3429 रुपए और शहर में 4594 रुपए ज्यादा कमाते हैं। यानी जहां एक घंटे के महिला को 70 या 80 रुपए मिलते हैं, वहीं पुरुष को उसके लिए 100 रुपए मिलते हैं। इसके अलावा पुरुष महिलाओें की अपेक्षा हर हफ्ते 12 घंटे ज्यादा काम करते हैं।

 

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