चालीस साल की उम्र में लगा 500 रुपये की रिश्वत लेने का दाग, चालीस साल तक कानूनी लड़ाई के बाद हुए बरी

corruption case

चैतन्य भारत न्यूज

बरेली. न्याय पाने के लिए जुनून देखना हो तो बिजनौर के मोल्ड़ह सिंह की कहानी प्रेरक हो सकती है। 40 साल की उम्र में उन पर 500 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगा था। तब से ही उन्होंने ठान लिया कि इस आरोप से मुक्ति पाना है। हालांकि इस लड़ाई में चालीस साल निकल गए और 80 साल की उम्र में वे इस आरोप से मुक्त हो गए। सोमवार को कोर्ट ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

यह अनूठा मामला वर्ष 1981 का है। मोल्हड़ सिंह चिड़ियापुर के तत्कालीन सहायक वन जंतु प्रतिपालक के पद पर तैनात थे। बिजनौर के बाबूराम का कहना था कि उन समेत चार लोगों पर जंगली सुअर मारने का आरोप लगा था। मोल्हड़ सिंह ने मामला खत्म करने के लिए सभी चार आरोपितों से सवा सौ-सवा सौ रुपये की रिश्वत ली थी। इसकी शिकायत विजिलेंस टीम से की गई। 10 अक्टूबर, 1981 को आरोपित मोल्हड़ सिह के खिलाफ नजीबाबाद में केस दर्ज कर लिया गया।

1985 में बिजनौर की स्पेशल कोर्ट ने अभियोजन स्वीकृति को गैरकानूनी बताते हुए फाइल बंद कर दी थी। कहा गया कि इस केस को दर्ज करने के लिए शासन से अनुमति लेने की सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अदालत ने सुझाव दिया कि यदि अभियोजन स्वीकृति नए सिरे से प्राप्त की जाए तो मुकदमा दोबारा शूरू किया जा सकता है। कुछ समय बाद नए सिरे से स्वीकृति के बाद दोबारा मुकदमा दर्ज हुआ। सालों केस चलता रहा।

इस मामले की सुनवाई स्पेशल भ्रष्टाचार निवारण एक्ट (द्वितीय) की कोर्ट में चल रही थी। सोमवार को विशेष जज ने फैसला सुनाया। अदालत ने आरोपित मोल्हड़ सिंह को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया यानी यह माना कि मोल्हड़ सिंह ने ऱिश्वत नहीं ली थी।

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