इस अनोखे मंदिर में भगवान जगन्नाथ स्वयं ही देते हैं मानसून आने की सूचना, मंदिर के गुंबद से टपकी बूंदें

चैतन्य भारत न्यूज

कानपुर. उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से करीब 50 किलोमीटर दूर घाटमपुर तहसील में स्थित बेहटा बुजुर्ग गांव में एक अदभुत मंदिर है, जो मानसून की सटीक भविष्यवाणी के लिए देश व प्रदेश में विख्यात है। इस प्राचीन जगन्नाथ मंदिर के गुंबद में लगे मानसूनी पत्थर से पानी की बूंदे टपकनी शुरू हो गई हैं। विशेष धार्मिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक तथ्यों से परिपूर्ण यह मंदिर 21वीं सदी के विज्ञान के लिए बड़ी चुनौती है।

चिलचिलाती धूम में तीन दिन पहले जब मंदिर की छत से पानी की बूंदें टपकीं तो क्षेत्र के किसान समझ गए मानसून आ रहा है और उन्होंने खेतीबाड़ी की तैयारी शुरू कर दी। मंदिर के पुजारी कुड़हा प्रसाद शुक्ल ने बताया कि, पानी की बूंदें 2 जून से टपकनी शुरू हुई हैं, अभी इनका आकार काफी छोटा है।

मानसून से एक सप्ताह पहले तेज गर्मी में भगवान जगन्नाथ मंदिर के ढांचे से बूंदे और बारिश में छत सूखने का रहस्य आज तक कोई वैज्ञानिक नहीं खोज पाया है। मंदिर की मान्यता के अलावा यह अपनी इसी विशेषता के लिए दुनिया भऱ में जाना जाता है। यह रहस्य जानने के लिए कई बार प्रयास हो चुके हैं, तमाम सर्वेक्षणों के बाद भी मंदिर के निर्माण तथा रहस्य का सही समय पुरातत्व वैज्ञानिक पता नहीं लगा सके हैं। अध्ययन से यह तो पता चला कि मंदिर का अंतिम जीर्णोद्धार 11वीं सदी में हुआ था लेकिन मंदिर का निर्माण कब हुआ यह रहस्य बना हुआ है।

गांव के बुजुर्गों चतुरी देवी (95), चंद्रकली (85), भगवानदीन (69) और मो.शौकत अली (81) ने बताया कि वह लोग अपने पुरखों से सुनते चले आए हैं कि जगन्नाथ मंदिर की छत पर लगे पत्थर से जब पानी की बूंदें टपकनी शुरू हो जाती हैं तो इसके एक पखवारे बाद मानसून सक्रिय हो जाता है। जानकारी के मुताबिक, यदि बूंदों का आकार कम होता है तो उस वर्ष बारिश भी कमजोर होती है। गांववालों ने बताया कि वह लोग पत्थर से टपकने वाली बूंदों को मानसूनी बारिश का आगाज मानकर खेती-किसानी के काम शुरू करने की तैयारी करते हैं।

देश-विदेश में इसकी ख्याति मानसूनी मंदिर के नाम से है। इस रहस्य को जानने के लिए कई बार प्रयास हो चुके हैं पर तमाम सर्वेक्षणों के बाद भी मंदिर के निर्माण तथा रहस्य का सही समय पुरातत्व वैज्ञानिक पता नहीं लगा सके। बस इतना ही पता लग पाया कि मंदिर का अंतिम जीर्णोद्धार 11वीं सदी में हुआ था। उसके पहले कब और कितने जीर्णोद्धार हुए या इसका निर्माण किसने कराया जैसी जानकारियां आज भी अबूझ पहेली बनी हुई हैं, लेकिन बारिश की जानकारी पहले से लग जाने से किसानों को जरूर सहायता मिलती है।

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