Navratri 2019 : अगर नहीं कर पा रहे हैं व्रत तो जरूर करें इन मंत्रों का जाप, मां भर देंगी आपकी झोली

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टीम चैतन्य भारत

नवरात्र का आज से आगाज हो चुका है। 6 अप्रैल से शुरू होने वाले नवरात्र 14 अप्रैल को संपन्न होंगे। नवरात्र के पहले दिन श्रद्धालु विधि-विधान से घर में पूजा-अर्चना करते हैं और कलश स्थापना करते हैं। मां की भक्ति में लीन श्रद्धालु नौ दिनों का व्रत रखते हैं और इस दौरान वह अन्‍न ग्रहण नहीं करते। बता दें मां दुर्गा की पूजा की तरह नवरात्र व्रत का काफी महत्‍व है। मां अपने बच्‍चों की हर मनोकामना पूरी करती हैं और उनके हर दुख हर लेती हैं। भक्‍तजन भी देवी मां को प्रसन्‍न करने के ल‍िए व्रत रखते हैं। परिस्‍थ‍ितिवश कुछ लोग मां दुर्गा का व्रत नहीं रख पाते हैं। अगर आप भी इस बार व्रत नहीं रख पा रहे हैं तो हम आपको ऐसे मंत्र के बारे में बता रहे हैं जो आप पर मां की कृपा बरसाने में मददगार साबित हो सकता है। इस व्रत का जाप आप रोजाना करे।

ये हैं मंत्र-

मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अर्थ- जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु मातृ-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अर्थ- जो देवी सभी प्राणियों में माता के रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभि-धीयते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अर्थ- जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

मंत्र- या देवी सर्वभूतेषू कान्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अर्थ- जो देवी सभी प्राणियों में तेज, दिव्यज्योति, उर्जा रूप में विद्यमान हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

मंत्र- सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥
मंत्र- हे नारायणी! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगल मयी हो। कल्याण दायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थो को (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को) सिद्ध करने वाली हो। शरणागत वत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।

मनोकामना पूर्ति के ल‍िए पढ़ें ये मंत्र

देहि सौभाग्य मारोग्यम देहीमें परमम सुखम
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।

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