एससी-एसटी एक्ट में सिर्फ शिकायतकर्ता के बयान पर्याप्त नहीं, ठोस सबूत होना भी आवश्यकः हाई कोर्ट का फैसला

jabalpur high court

चैतन्य भारत न्यूज

जबलपुर. मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने गुरुवार को एससी-एसटी एक्ट के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला लेने के साथ ही यह सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि, एससी-एसटी एक्ट के मामले में अगर कोई पुख्ता सबूत न हों तो सिर्फ शिकायतकर्ता द्वारा दिया गया बयान आरोपित के खिलाफ अभियोजन चलाने का आधार नहीं बन सकता। मामले की सुनवाई जस्टिस जेपी गुप्ता की एकल पीठ कर रही थी। पीठ ने यह भी कहा कि यह सिद्धांत उस केस में और महत्वपूर्ण हो जाता है जब विश्वसनीय साक्ष्य और गवाह शिकायतकर्ता के बयान को झूठा साबित करते हों। एकल पीठ ने इस मामले में यह भी कहा कि, ‘यह जिम्मेदारी सभी अदालतों की है कि वे हर स्तर पर इस बात का ध्यान रखें कि किसी भी तरह से अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो। इसी के साथ कोर्ट ने याचिकाकर्ता सुशांत पुरोहित के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर और ट्रायल कोर्ट की प्रक्रिया को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी बताया कि इस मामले में विवाद मजदूरी के भुगतान और फसल कटाई में देरी को लेकर था। इससे नाराज होकर महिला ने झूठा प्रकरण दर्ज कराया था।

यह है मामला

शिकायतकर्ता महिला 5 अप्रैल 2016 को सुशांत नामक व्यक्ति के खेत में काम कर  रही थी। थाने में दर्ज हुई शिकायत के अनुसार, महिला को फसल की कटाई करने में देरी हो गई थी जिसके चलते सुशांत ने उसके साथ मारपीट की और उसका घर जलाने की कोशिश भी की थी। जब इस मामले में थाना प्रभारी ने जांच की तो उन्होंने सभी आरोप झूठे पाए। स्थानीय लोगों ने भी इस तरह की किसी भी घटना होने से साफ इनकार कर दिया। इस मामले में पुलिस अधिकारी ने एसडीओ को रिपोर्ट पेश कर दी। शिकायतकर्ता महिला फिर हाई कोर्ट पहुंची और सुशांत के खिलाफ मामला दर्ज करने की मांग की। इसके बाद हाई कोर्ट ने नरसिंहपुर एसपी को महिला की शिकायत पर फिर से विचार करने के निर्देश दिए। इसके बाद सुशांत के खिलाफ एससी- एसटी एक्ट में मामला दर्ज कर कोर्ट में चालान पेश किया गया। फिर सुशांत ने भी हाई
कोर्ट में याचिका लगाई।

महिला ने शिकायत के बाद बनवाया था जाति प्रमाण-पत्र

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदर्श मुनि त्रिवेदी ने कोर्ट को बताया कि घटना के समय उनका मुवक्किल यह बात नहीं जानता था कि महिला एससी-एसटी वर्ग की है। महिला ने मुस्लिम से शादी की है, इसलिए शादी के बाद उसे उक्त वर्ग का नहीं माना जा सकता। इसके अलावा अभियोजन ने चालान पेश करते के दौरान जो जाति प्रमाण-पत्र पेश किया वह महिला ने केस दर्ज करने के बाद बनवाया था। त्रिवेदी ने कोर्ट को बताया कि अभियोजन ने चालान में ऐसा कोई सबूत भी पेश नहीं किया कि अभियुक्त उक्त वर्ग का नहीं है, जो कि ऐसे मामलों में एक अहम तथ्य होता है।

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