कोरोना संकट के बीच टीबी, कालरा जैसी गरीबी से जुड़ी गंभीर बीमारियों की अनदेखी पड़ सकती है भारी

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चैतन्य भारत न्यूज

बेंगलुरु. इन दिनों पूरी दुनिया कोरोना जैसी महामारी से जूझ रही है। कई देश कोरोना को खत्म करने के लिए वैक्सीन बनाने में जुटे हुए हैं। कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए देशभर में पिछले दो महीने से लॉकडाउन लागू है। लेकिन फिर भी इसका संक्रमण बढ़ता जा रहा है। इसी बीच स्वास्थ्य से जुड़े एक विशेषज्ञ ने आगाह किया है कि, लॉकडाउन से जितना लाभ नहीं होगा, उससे ज्यादा नुकसान इस दौरान टीबी और कालरा जैसी बीमारियों की अनदेखी से हो सकता है।

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के हैदराबाद स्थित भारतीय लोक स्वास्थ्य संस्थान में प्रोफेसर वी. रमना धारा ने बताया कि, कोरोना वायरस के चलते जारी लॉकडाउन में टीबी, कुपोषण और कालरा जैसी गरीबी से जुड़ी अन्य बीमारियों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कोरोना संकट के बीच भले ही यह नुकसान नजर आ रहा हो, लेकिन इन बीमारियों के कारण होने वाली जनहानि को भी ध्यान रखना जरूरी है।

प्रोफेसर धारा ने कहा कि, ‘ऐसा न हो कि लॉकडाउन में हम जितनी जिंदगियों को बचाएं, इन बीमारियों से होने वाली मौतें उसके मायने ही खत्म कर दें। हमें इस महामारी को इस रूप में देखना चाहिए कि इसके जरिए प्रकृति हमसे बदला ले रही है। हमने प्रकृति को भारी नुकसान पहुंचाया है। जानवरों की बस्तियां उजाड़ दी है, जिसका ही ये परिणाम है कि जानवर मनुष्य के ज्यादा करीब आ गए।’

प्रोफेसर धारा ने देश में कोरोना महामारी के हालात का आंकलन करते हुए कहा कि, ‘मई के अंत तक देश में एक लाख संक्रमितों की आशंका व्यक्त की गई थी, जो संख्या अभी ही पीछे छूट गई है। संक्रमितों की संख्या तेजी से बढ़ भी रही है। हालांकि, मृत्यु दर स्थिर बनी हुई है लेकिन कुल मौतें ज्यादा अहम हैं। देश में कोरोना के कई ऐसे भी मरीज होंगे जिन्होंने कोरोना की जांच न कराई हो और उनकी घर में ही मौत हो गई हो। ऐसी मौतों की गणना कोरोना वायरस से होने वाली मौतों में नहीं होगी।’

उन्होंने यह भी कहा कि, भारत में फिलहाल कोरोना अपनी चरम पर नहीं पंहुचा है लेकिन फिर भी संक्रमण के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। यदि संक्रमण के मामलों में कमी आती है तो हमें साल 1918 में हुए स्पेनिश फ्लू की तरह ही कोरोना की तेजी के साथ संभावित वापसी के लिए तैयार रहना होगा।

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