अक्टूबर तक दस्तक दे सकती है कोरोना की तीसरी लहर, जानिए बच्चों पर कितना हो सकता है असर?

चैतन्य भारत न्यूज

कोरोना की दूसरी लहर से थोड़ी राहत मिलने के बाद अब तीसरी लहर की आशंका जताई जा रही है। इससे निपटने के लिए तैयारियों ने जोर पकड़ लिया है। इस बीच कुछ मेडिकल एक्सपर्ट्स ने संभावना जताई है कि भारत में अक्टूबर तक महामारी की तीसरी लहर आ सकती है।

कोरोना की दूसरी लहर ने खूब तबाही मचाई, ऐसे में कोरोना के डेल्टा प्लस वेरिएंट से हर कोई डरा हुआ है। अब महाराष्ट्र टास्क फोर्स ने कोरोना की तीसरी लहर को लेकर चेतावनी जारी की है। उन्होंने कहा कि, अगर नियमों का पालन नहीं किया गया तो दो से चार हफ्तों के भीतर ही महाराष्ट्र में कोरोना की तीसरी लहर आ सकती है। टास्क फोर्स के मुताबिक तीसरी लहर बच्चों के लिए काफी घातक साबित हो सकती है। इसमें लगभग 10 प्रतिशत बच्चे प्रभावित हो सकते हैं।

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की ओर से कराए गए सर्वे में विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि, भारत तीसरी लहर का मुकाबला दूसरी लहर से बेहतर तरीके से करेगा। उन्होंने कहा है कि कोरोना महामारी कम से कम एक साल और जन स्वास्थ्य के लिए चिंता की वजह बना रहेगा।

दुनियाभर के 40 हेल्थकेयर स्पेशलिस्ट, डॉक्टर, साइंटिस्ट, वायरोलॉजिस्ट और महामारी विशेषज्ञों को इस सर्वे में शामिल किया गया था। 3-17 जून के बीच कराए गए इस सर्वे में जिन विशेषज्ञों ने माना कि तीसरी लहर आएगी, 85 फीसदी या 24 में से 21 ने कहा कि तीसरी लहर अक्टूबर तक आएगी। तीन अन्य ने इसके अगस्त में आने की भविष्यवाणी की तो 12 ने सितंबर में शुरुआत की बात कही है। अन्य ने कहा कि तीसरी लहर नवंबर से फरवरी के बीच आ सकती है।

बच्चों पर तीसरी लहर का कितना असर?

नीति आयोग के सदस्स (स्वास्थ्य) डॉक्टर वी.के. पॉल ने स्वास्थ्य मंत्रालय की नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान शुक्रवार को बताया कि डब्ल्यूएचओ-एम्स के सीरो सर्वे के दौरान जो आंकड़े सामने आए हैं, उसके बाद यह जाहिर होता है कि कोरोना की तीसरी लहर का बच्चों पर ज्यादा असर नहीं होगा।

पॉल ने बताया कि इस सर्वे के दौरान 18 साल से ऊपर और उससे कम के लोगों के बीच सर्वे में सीरो पॉजिटिविटी दर लगभग बराबर रही। उन्होंने कहा कि 18 साल से ऊपर को लोगों में सीरो पॉजिटिविटी दर 67 फीसदी और 18 से नीचे के लोगों में यह 59 फीसदी थी। शहरी क्षेत्रों में 18 साल से नीचे के लोगों में यह दर 78 फीसदी और 18 साल के ऊपर के लोगों में यह 79 फीसदी पाई गई।

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