पुण्यतिथि विशेष: देशरत्न कहे जाते थे भारत के प्रथम राष्ट्रपति, जानें डॉ. राजेंद्र प्रसाद से जुड़ी कुछ खास बातें

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चैतन्य भारत न्यूज

देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की आज 57वीं पुण्यतिथि है। 3 दिसंबर 1884 को जन्में राजेंद्र प्रसाद को देशरत्न के नाम से भी जाना जाता है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं राजेंद्र से जुड़ी कुछ खास बातें…



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डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 में बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम महादेव सहाय और माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। उनके पूर्वज मूलरुप से कुआंगांव- अमोढ़ा (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले थे। राजेंद्र के पिता महादेव सहाय संस्कृत एवं फारसी के विद्वान थे। 5 साल की आयु से ही उन्होंने फारसी सीखना शुरु कर दिया। राजेंद्र जब 13 साल के थे तो उनका विवाह राजवंशी देवी से हो गया।

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राजेंद्र की प्रारंभिक शिक्षा छपरा (बिहार) के जिला स्कूल से हुई। उन्होंने 18 साल की उम्र में कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा प्रथम स्थान से पास की। विश्वविद्यालय की ओर से उन्हें 30 रुपए की स्कॉलरशिप मिलती थी। साल 1915 में राजेंद्र बाबू ने कानून में मास्टर की डिग्री हासिल की। साथ ही उन्होंने कानून में ही डाक्टरेट भी किया। राजेंद्र पढ़ाई लिखाई में अच्छे थे, उन्हें अच्छा स्टूडेंट माना जाता था। उनकी एग्जाम शीट को देखकर एक एग्जामिनर ने कहा था कि ‘The Examinee is better than Examiner।

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आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को भारत को गणतंत्र राष्ट्र का दर्जा मिलने के साथ राजेंद्र देश के प्रथम राष्ट्रपति बने। 25 जनवरी 1950 को उनकी बहन भगवती देवी का निधन हो गया था। जबकि अगले दिन यानी 26 जनवरी भारतीय संविधान लागू होने जा रहा था। ऐसे में राजेंद्र भारतीय गणराज्य के स्थापना की रस्म के बाद ही दाह संस्कार में भाग लेने गए। साल 1957 में वह दोबारा राष्ट्रपति चुने गए। राजेंद्र प्रसाद एकमात्र नेता रहे, जिन्हें 2 बार राष्ट्रपति के लिए चुना गया। 12 साल तक पद पर बने रहने के बाद वे 1962 में राष्ट्रपति पद से हटे।

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राजेंद्र राष्‍ट्रपिता गांधी से बेहद प्रभावित थे, राजेंद्र प्रसाद को ब्रिटिश प्रशासन ने 1931 के ‘नमक सत्याग्रह’ और 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान जेल में डाल दिया था। राजेंद्र को लिखने पढ़ने और अलग-अलग भाषा से बहुत लगाव था। हिंदी-अंग्रेजी के अलावा उन्हें बंगाली और गुजराती का भी व्यावहारिक ज्ञान था। उन्होंने अपनी आत्मकथा (1994) समेत ‘बापू के कदमों में’, ‘इण्डिया डिवाइडेड’, ‘सत्याग्रह ऐट चंपारण’, ‘गांधीजी की देन’, ‘भारतीय संस्कृति व खादी का अर्थशास्त्र’ जैसी किताबें लिखी हैं।

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साल 1962 में राष्ट्रपति पद से हट जाने के बाद राजेंद्र प्रसाद को भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। जिंदगी के आखिरी दिनों में वह फिर से अपने जन्मभूमि बिहार लौट गए थे। वहां पटना के पास सदाकत आश्रम में उन्होंने 28 फरवरी 1963 को अंमित सांस ली।

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