भारत में कहीं पूजनीय तो कहीं निंदनीय है रावण, जानें लंकापति से जुड़ी कुछ अनूठी परंपराएं

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चैतन्य भारत न्यूज

देशभर में रावण का पुतला जलाकर दशहरा पर्व मनाया जाता है। लेकिन मध्यप्रदेश में कुछ ऐसी भी जगहें हैं जहां न तो रावण का पुतला जलाया जाता है और न ही उनका वध किया जाता है। बल्कि इन स्थानों पर दशहरे के दिन रावण की पूजा-अर्चना की जाती है। आइए जानते हैं कौन-कौन हैं वो स्थान जहां रावण को पूजा जाता है।



चिकली

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उज्जैन रोड पर बड़नगर से 28 किमी दूर ग्राम चिकली में एक चबूतरे पर रावण की प्रतिमा है, जहां लोग विजयदशमी के दिन रावण की पूजा करते हैं। यहां के लोगों का मानना है कि रावण की पूजा से गांव में सुख समृद्धि बनी रहती है।

तनोड़िया

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आगर जिले के तनोड़िया गांव में रावण को लेकर एक अनूठी परंपरा है। यहां दशहरे के दिन रावण का दहन करने की बजाय पत्थरों से मारते हैं। यहां शारदीय नवरात्रि में नगर में मिट्टी और मटकों से बने रावण पर पत्थर बरसाए जाते हैं, जबकि चैत्र शुक्ल की नवरात्रि में रावण का दहन किया जाता है।

रावण गांव

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विदिशा जिले के रावण गांव में रावण की प्रतिमा कई सालों से स्थापित है। यहां के लोग रावण को सम्मान के रूप में रावण बाबा बुलाते हैं। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करने से पहले लोग रावण बाबा का आशीर्वाद लेते हैं। दशहरे के दिन यहां बाबा की प्रतिमा की नाभि में रुई में तेल लेकर लगाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से उनकी नाभि में लगे तीर का दर्द कम होगा और वे गांव में खुशहाली देंगे।

सतवास

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देवास जिले के सतवास में रावण दहन की एक अनोखी परंपरा है। यहां रावण की प्रतिमा मिट्टी से तैयार की जाती है। मान्यता है कि, रावण बेहद बुद्धिमान और शास्त्रों का ज्ञाता था इसलिए रावण की मिट्टी प्रतिमा का पूजन करने के बाद नागरिक प्रतिमा की मिट्टी अपने-अपने घर ले जाते हैं और उसे पूजा घर में रखते हैं। लोगों का मानना है कि ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है।

छतरपुर गांव

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बैतूल जिले से 60 किमी दूर बसे छतरपुर गांव में भी रावण की पूजा-अर्चना की जाती है। छतरपुर में रावण का मंदिर भी है। यहां के आदिवासी रावण को अपना इष्ट और कुल देवता मानते हैं।

खंडवा

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जिला मुख्यालय से 70 किमी दूर ओंकारेश्वर में भी रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है। यहां रावण का पुतला दहन न करने की परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है। इसके पीछे एक पौराणिक कहानी भी है। कहा जाता है रावण को अहंकार था कि उससे बड़ा कोई शिवभक्त नहीं इसलिए वह ब्राह्मण के रूप में ओंकारेश्वर आया। शिव भक्त राजा मांधाता ने देखते ही उसे पहचान लिया जिससे रावण आश्चर्यचकित हो गया और उसका अहंकार चकनाचूर हो गया। रावण और मांधाता दोनों ही भगवान शिव के सच्चे भक्त थे इसलिए ओंकारेश्वर में मांधाता की तरह ही रावण की भी पूजा की जाती है।

मंदसौर

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मध्यप्रदेश के मंदसौर नगर के खानपुरा क्षेत्र में ‘रावण रूण्डी’ नाम के स्थान पर रावण की एक विशाल मूर्ति है। जहां दशहरे के दिन रावण की विशेष रूप से पूजा होती है। कहा जाता है रावण मंदसौर (दशपुर) का दामाद था। रावण की पत्नी मंदोदरी की वजह से ही दशपुर मंदसौर के नाम से जाना जाता है।

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