रोग से ज्यादा रोग के भय से भयभीत विश्व

टीम चैतन्य भारत

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में व्यक्ति पहले तो रोगों पर ध्यान ही नहीं देता फिर वह छोटे-छोटे विकारों को लेकर बेकार मेें ही तनाव में चला जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कई बार संकेत किया है कि आपाधापी से भरे इस युग में निदान एवं चिकित्सा के आधुनिकतम साधन होने के बाद भी रोगों में कहीं कमी नज़र नहीं आती । बल्कि रोगों की जटिलता और अधिक बढ़ गई है, जिसके लिए अन्य कारणों की अपेक्षा व्यक्ति की नकारात्मक सोच और स्वयं के प्रति दृष्टिकोण बेहद महत्वपूर्ण घटक हैं| अधिक और अधिक पाने की होड़, वैभव-सुख साधनों की लालसा इतनी तीव्र है कि व्याधिग्रस्त काया, भयग्रस्त मस्तिष्क एवं उद्विग्नता की कीमत पर भी वह यह दौड़ छोड़ना नहीं चाहता। इसका उपचार बाहर नहीं बल्कि हमारी अपनी सोच पर निर्भर है।

शोधों में निकला यह परिणाम

“अन्डरस्टेण्डिंग ह्यूमन बिहेवियर” नामक विश्वकोश में रोगों के कारण व उपचार पर एक शोध अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। जहां कई रोगियों पर प्रयोगों में यह पाया गया है कि उन्हें दवाओं की नहीं बल्कि अपनी सोच को “सकारात्मक” और जीवनशैली को “प्रकृतिसम्मत” बनाए रखने की अधिक ज़रूरत है। संक्षेप में कहें तो शरीर से अधिक “मानस चिकित्सा” की आवश्यकता है।

वस्तुतः रोगी की सुनने के लिए आज किसी के पास समय नहीं है। समस्या निदान हेतु आजकल जो जांचों की बाढ़ आई हुई हैं, जैसे मूत्र, रक्त-परीक्षण से लेकर, एक्सरे, ई.सी.जी. आदि, उससे रोगी का मन रोग की जटिलता की कल्पना करते हुए अपनी स्थिति को और अधिक गंभीर बना देता है, उसे सहज ही रोग की गंभीरता का सम्मोहन देता रहता है। जितनी ज्यादा जांच जिस किसी भी रोगी की हुई हो, वह उतना ही गंभीर, असाध्य एवं जांच करवाने वाले चिकित्सक को सबसे बड़ा विशेषज्ञ माना जाता है।

चिकित्सकों के अनुभव
इस बारे में “स्वीट नथिंग्स” शीर्षक से डॉ. ए. जे. क्रोनिन ने अपने अनुभवों के आधार पर एक ग्रन्थ लिखा है। जहां उन्होंने बताया कि “मैं सफल चिकित्सक इसलिए माना जाता था, कि मैंने व्यक्ति के मनोविज्ञान को बेहतर तरीके से समझा, समय की मांग एवं रोगी की मनोवृत्ति के अनुरूप औषधियां दीं। ये औषधियां खड़िया मिट्टी की रंग-बिरंगी गोलियां मात्र थीं , किन्तु इन्हें देते समय रोगी को पूर्ण विश्वास में लिया, उससे सुना, समय दिया और इस सहज तकनीक ने राम बाण का काम किया।

दरअसल केवल शरीर की नहीं बल्कि मन की चिकित्सा भी महत्वपूर्ण होती है, इस सन्दर्भ में “हार्वर्ड मेडिकल स्कूल” के प्रोफेसर हेनरी के. बीचर ने लिखा है कि चिकित्सा के पूर्व यदि रोगी की मनःस्थिति की पढ़कर “प्लेसिबो” औषधियां (वे औषधियां हैं जो शरीर पर कोई घातक प्रभाव नहीं डालतीं व गुर्दे-मल मार्ग द्वारा बाहर निकाल दी जाती हैं) दी जाएं तो काफी सीमा तक औषधि प्रदूषण से बचा जा सकता है।कई बार रोग पर निरंतर विचार करने से ही रोग के लक्षण व्यापक हो जाते हैं, अतेव चिकित्सक पहले रोग के अनावश्यक भय को रोगी के मन से बाहर निकालें। अनावश्यक दवाएं रोगी को अधिक रोग ग्रस्त बना देती है। इसलिए रोगी का उपचार करते समय दवाओं के साथ सकारात्मक चिंतन पर भी जोर दें|

वस्तुतः रोग, चिन्तन की अस्त-व्यस्तता के परिणाम स्वरूप जन्मते हैं। यदि आत्म निरीक्षण की पद्धति अपनाई जाए तो न केवल रोग से मुक्ति मिल सकती है अपितु विद्यमान क्षमताओं का परिपूर्ण सदुपयोग भी हो सकता है।

सकारात्मक सोच के स्वास्थ्य लाभ

शोधकर्ताओं ने स्वास्थ्य पर सकारात्मक सोच और आशावाद के प्रभावों का पता लगाना जारी रखा है। सकारात्मक सोच रखने वालों में  निम्नलिकित स्वास्थ्य लाभ शीघ्र दिखाई देतें हैं।

  • जीवन काल बढ़ा
  • अवसाद की कमी
  • तनाव में कमी
  • आम सर्दी/ एलर्जी के लिए अधिक प्रतिरोधक क्षमता का विकसित होना
  • बेहतर मनोवैज्ञानिक और शारीरिक क्षमता
  • बेहतर स्वास्थ्य और आकस्मिक हृदयघात का खतरा टला
  • कठिनाइयों और तनाव के समय में संतुलित स्थिति।

एक सिद्धांत यह है कि सकारात्मक दृष्टिकोण रखने से आप तनावपूर्ण परिस्थितियों को भी बेहतर तरीके से सामना कर सकते हैं, जो आपके शरीर पर तनाव के हानिकारक स्वास्थ्य प्रभावों को कम करता है।

क्या करें

  • स्वयं की स्थिति सुधारने के लिए आवश्यक बदलाव की पहचान करें। आप आशावादी बने और अधिक सकारात्मक सोच में संलग्न रहें।
  • अपने जीवन के उन क्षेत्रों की पहचान करें, जिनके बारे में आप आमतौर पर नकारात्मक सोचते हैं। अपने आप में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए आत्मनिरीक्षण करें। दिन के दौरान समय-समय पर रुकें और मूल्यांकन करें कि आप क्या सोच रहे हैं।
  • यदि आप पाते हैं कि आपके विचार मुख्य रूप से नकारात्मक हैं, तो उन पर एक सकारात्मक विचार को स्थापित करें।
  • अपने आप को मुस्कुराने या हंसने की अनुमति दें, खासकर मुश्किल समय के दौरान। हर रोज होने वाली घटनाओं में हास्य की तलाश करें। जब आप हंसते हैं, तो आप कम तनाव महसूस करते हैं।
  • एक स्वस्थ जीवन शैली का पालन करें। सप्ताह के अधिकांश दिनों में लगभग 30 मिनट तक व्यायाम करने का लक्ष्य रखें। अपने मन और शरीर को ईंधन देने के लिए स्वस्थ आहार का पालन करें।

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