भारतीय फिल्म इतिहास में मई का महीना इसलिए है खास, पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र हुई थी रिलीज

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चैतन्य भारत न्यूज।

भारत की पहली फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र मात्र 40 मिनट की थी लेकिन इसने भारतीय सिनेमा का इतिहास लिखने की ऐसी शुरुआत की कि आज भारत में हर साल कई भाषाओं में करीब दो हजार फिल्में बनती हैं। धुंडिराज गोविंद यानी दादासाहेब फाल्के द्वारा बनाई गई और निर्देशित की गई यह मूक फिल्म 3 मई 1913 को रिलीज हुई थी। भारतीय फिल्म इंडस्ट्री दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है। लेकिन, पहली फीचर फिल्म बनने की कहानी भी कम फिल्मी नहीं है। 14 अप्रैल 1911 को दादासाहेब फाल्के अपने बड़े बेटे भालचंद्र के साथ गिरगांव के अमेरिका- इंडिया पिक्चर पैलेस में अमेजिंग एनिमल्स फिल्म देखने गए। सिनेमा के पर्दे पर जानवरों को देखकर वे अचंभित रह गए। भालचंद्र ने अपनी मां सरस्वतीबाई को इसके बारे में बताया तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। इस पर दादासाहेब अपने परिवार को अगले ही दिन फिल्म दिखाने ले गए। उस दिन ईस्टर था इसलिए थियेटर में ईसा मसीह के जीवन पर बनी फिल्म ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ दिखाई जा रही थी। ईसा मसीह को स्क्रीन पर देखकर दादासाहेब के दिमाग में राम और कृष्ण के चरित्र आने लगे। दादासाहेब ने इस बारे में बताया था कि वह फिल्म जीसस पर देख रहे थे पर उनकी आंखों के सामने हिंदू देवी-देवता ही दिख रहे थे। वे एक तरह से सम्मोहित होते जा रहे थे। उन्होंने दोबारा फिल्म को देखा। फाल्के का कहना था कि दूसरी बार में उन्हें ऐसा लग रहा था कि जैसे उनके विचार स्क्रीन का रूप ले रहे हैं। उन्होंने सोचा कि क्या हम भारतीय कभी अपनी तस्वीरें भी स्क्रीन पर देखेंगे? यही सोचते- सोचते उन्होंने मूविंग पिक्चर के बिजनेस में हाथ आजमाने का निर्णय कर लिया।

उन्हें फिल्म बनाने के बारे में बहुत जानकारी नहीं थी इसलिए उन्होंने लंदन में फिल्म बनाने की तकनीक का दो सप्ताह का प्रशिक्षण लिया और 1 अप्रैल 1912 को फाल्के फिल्म कंपनी की स्थापना की। अपने लंदन प्रवास के दौरान ही फाल्के ने एक विलियमसन कैमरा, कोडक की रॉ फिल्म और परफोरेटर खरीदने का ऑर्डर दे दिया जो मई, 1912 में बंबई (अब मुंबई) पहुंच गए। उन्होंने एक प्रोसेसिंग रूम बनाया और अपने परिवार को फिल्म डेवलप और परफोरेट करना सिखाया। फाल्के फिल्म बनाने के अपने विचार को लेकर प्रतिबद्ध थे लेकिन उनको कोई निवेशक नहीं मिल रहा था। इसलिए उन्होंने तकनीक का प्रदर्शन करने के लिए एक लघु (शॉर्ट) फिल्म बनाने का फैसला किया। उन्होंने एक बर्तन में कुछ मटर बोए और उनके सामने कैमरा रखकर एक महीने तक रोजाना एक फ्रेम शॉट लिया। इससे एक मिनट से कुछ लंबी फिल्म तैयार हुई। जिसमें बीज से अंकुर और फिर पौधा और बाद में उसकी बेल बनना दिखाया गया था। फाल्के ने इसे अंकुराची वाढ़ (मटर के पौधे का बढ़ना) नाम दिया। उन्होंने इस फिल्म को कुछ खास लोगों को दिखाया। इनमें से यशवंतराव नाडकर्णी और नारायणराव देवहरे ने फाल्के को ऋण देने की पेशकश की। इसके बाद फाल्के ने कई अखबारों में विज्ञापन देकर राजा हरिश्चंद्र के लिए अभिनय करने वाले (कास्ट) और तकनीकी सहयोगियों (क्रू) के लिए आवेदन मांगे। उस समय महिला का अभिनय करने के लिए कोई महिला नहीं मिलती थी तो पुरुषों ने ही महिलाओं के वेश में ऐसी भूमिकाओं को निभाया। फाल्के ने चार रील की इस फिल्म का निर्माण छह माह 27 दिन में पूरा कर लिया।

बंबई (अब मुंबई) के ओलंपिया थिएटर में राजा हरिश्चंद्र फिल्म का 21 अप्रैल 1913 को प्रीमियर हुआ और गिरगांव के कॉरोनेशन सिनेमा ने इसे 3 मई 1913 को रिलीज किया गया। यह फिल्म जबरदस्त तरीके से सफल रही और इसने देश में सिनेमा उद्योग की नींव रखी। अब इस फिल्म का कुछ ही हिस्सा सुरक्षित है। यह राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार में रखा हुआ है। इस फिल्म में राजा हरिश्चंद्र की भूमिका में दत्तात्रेय दाबके और उनके पुत्र रोहिताश्व की भूमिका में दादासाहेब के बेटे भालचंद्र फाल्के थे। अन्ना सालुंके ने रानी तारामती और गजानन साने ने विश्वामित्र की भूमिका निभाई थी।

राजा हरिश्चंद्र को पहली पूर्ण भारतीय फीचर फिल्म मानने को लेकर भी काफी बहस हुई। कुछ फिल्म इतिहासकारों की नजर में दादासाहेब थोर्ने की फिल्म श्री पुंडलिक पहली भारतीय फिल्म थी, जो 18 मई 1912 को रिलीज हुई थी। लंबी बहस के बाद राजा हरिश्चंद्र के पक्ष में फैसला हुआ क्योंकि श्री पुंडलिक में वस्तुतः एक नाटक को एक फिक्स कैमरे से फिल्माया गया था। इसके अलावा इसे एक ब्रिटिश कैमरामैन ने शूट किया था और फिल्म की प्रोसेसिंग भी लंदन में हुई थी। भारत सरकार ने भी राजा हरिश्चंद्र को ही पहली फिल्म का दर्जा दिया। दादा साहेब फाल्के के भारतीय सिनेमा में इस योगदान के लिए ही देश में सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान उनके नाम पर दिया जाता है।

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