किस्सा कुछ यूं हैः ‘धरती पुत्र’ मुलायम सिंह को पहलवानी के साथ पढ़ाई का भी था शौक

चैतन्य भारत न्यूज

लखनऊ. राजनीति में कई किरदार इतने अनूठे और दिलों पर राज करने वाले होते हैं कि उनके बारे में किस्सों की कोई कमी नहीं होती। उनका व्यक्तित्व भी कम प्रेरक नहीं होता। कहानियां इतनी होती हैं किताबें कम पड़ जाती हैं। ऐसा ही एक व्यक्तित्व है उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का। धरती पुत्र के नाम से पहचाने जाने वाले मुलायम सिंह यादव पर करीब 28 किताबें लिखी गई हैं। पहलवानी के शौकीन मुलायम सिंह यादव को पढ़ाई से भी कम प्रेम नहीं था।

कुश्ती के दांवपेच आजमा बने राजनीति के पहलवान

मुलायम सिंह यादव का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के सैफई में 22 नवंबर, 1939 को हुआ था। इनके पिता का नाम सुघर सिंह और माता का नाम मूर्ति देवी है। पिता सुघर सिंह उन्हें बड़ा पहलवान बनाना चाहते थे। यही वजह थी कि उन्होंने पहलवानी भी सीखी। मुलायम का मनपसंद दांव था चरखा दांव। उन्होंने कई कुश्तियां लड़ी। अखाड़े में अच्छे-अच्छों को पटखनी दी लेकिन पढ़ाई में भी उनका बहुत मन लगता था। उन्हें पढ़ाना भी पसंद था इसलिए बीटीसी की शिक्षा हासिल की और इंटर कॉलेज में पढ़ाना भी शुरू कर दिया। पढ़ाना शुरू करने के बाद कुश्ती लड़ना छोड़ दी लेकिन उसका आयोजन हमेशा करवाते हैं। मुलायम ने हमेशा पढ़ाई को प्राथमिकता दी। उन्होंने राजनीतिक जीवन से समय निकाल कर आगरा यूनिवर्सिटी से राजनीतिक शास्त्र की डिग्री ली।

समाज में ऊंच-नीच के विरोधी

मुलायम सिंह की पहली शादी घरवालों ने 18 साल की उम्र में ही कर दी थी। मुलायम उस वक्त दसवीं में थे। लोग बताते हैं कि उस वक्त वाहनों का इतना चलन नहीं था इसलिए मुलायम की बरात भैंसागाड़ी से गई थी। हालांकि मुलायम सिंह शुरू से खुले विचारों के थे। वे जाति प्रथा, ऊंच-नीच के भी विरोधी थे। एक घटना है, तीसरी कक्षा में एक उच्च जाति का लड़का जाटव छात्र को पीट रहा था। मुलायम ने न सिर्फ मदद मांग रहे उस लड़के की मदद की, बल्कि पीटने वाले लड़के की पिटाई भी की थी। मुलायम सिंह यादव 15 वर्ष की उम्र में लोहिया के आंदोलन से जुड़े। वे गांव-गांव जाया करते थे। इसी दौरान वे पास के गांव में पहुंचे। जहां कथित नीची जाति के लोग रहते थे। अपने साथियों के साथ पहुंचे मुलायम सिंह ने उनका आतिथ्य भी स्वीकार किया जो कि उस दौर में घृणित माना जाता था। नीची जाति का आतिथ्य स्वीकार करने की वजह से मुलायम को सैफई गांव में पंचायत में हाजिर होना पड़ा था, लेकिन मुलायम ही वह शख्सियत हैं, जो किसी भी दबाव में झुके नहीं। उनसे जब कहा गया कि या तो अब नीची जाति के लोगों से मिलना छोड़ दो या जुर्माना दो, तो उन्होंने कहा जुर्माना दूंगा।

जमीन से जुड़े नेता ने हासिल की ऊंचाइयां

मुलायम सिंह उत्तरप्रदेश की राजनीति में एक ऐसा नाम है जिसने अपने दम पर जमीन से जुड़े रहने के साथ ही सियासी शिखर तक का सफल तय किया। उनके बारे में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह कहते थे यह छोटे कद का बड़ा नेता है। मुलायम सिंह 1967 में पहली बार विधान सभा के सदस्य चुने गए थे। साल 1992 में उन्होंने समाजवाद का नारा बुलंद किया और समाजवादी पार्टी बनाई। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। देश में जब ठाकुर-पंडित की राजनीति होती थी ऐसे में मुलायम ने यादव सहित सभी पिछड़ी जातियों को एक करके उन्हें पहचान दिलाने का काम किया।

गठबंधन की राजनीति के जनक

मुलायम सिंह यादव को गठबंधन की राजनीति का जनक भी कहा जाता है। उन्होंने पहली बार बसपा-सपा के गठजोड़ से उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई और खुद मुख्यमंत्री बने। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर पहली बार जसवंत नगर क्षेत्र से 28 वर्ष की उम्र में मुलायम 1967 में विधानसभा सदस्य चुने गए। इसके बाद तो वे 1974, 77, 1985, 89, 1991, 93, 96 और 2004 और 2007 में विधान सभा सदस्य चुने गए। इस बीच वे 1982 से 1985 तक यूपी विधान परिषद के सदस्य और नेता विरोधी दल रहे। पहली बार 1977-78 में राम नरेश यादव और बनारसी दास के मुख्यमंत्रित्व काल में सहकारिता एवं पशुपालन मंत्री बनाए गए। इसके बाद से ही वे करीबी लोगों के बीच मंत्रीजी के नाम से जाने लगे। वे तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और केंद्र में रक्षा मंत्री रह चुके हैं।

दो बार हो चुका है हमला

मुलायम की बढ़ती लोकप्रियता से परेशान होकर विरोधियों ने उन पर हमला भी करवाया था। 1984 में मैनपुरी के करहल ब्लॉक के कुर्रा थाने के तहत महीखेडा गांव के बाहर उन पर लौटते वक्त हमला हो गया था। दरअसल मुलायम गांव में एक शादी में शामिल होने गए थे। तब हमलावरों ने उन पर झाड़ियों में छिपकर गोलियों से हमला कर दिया था। मुलायम ने चालाकी बरतते हुए सुरक्षाकर्मियों से कहा कि जोर-जोर से चिल्लाओ नेताजी मार दिए गए। सुरक्षाकर्मियों ने वैसा ही किया और हमलावर उनकी बात सुनकर आश्वस्त होकर भाग गए। इसके कुछ साल बाद मुलायम पर एक बार फिर हमला हुआ था। चुनाव अभियान के तहत क्रांति रथ से चल रहे मुलायम पर हैवरा के पास एक मिल से काफी गोलियां चली। सड़क पर बम भी रखे गए थे। इस हमले में मुलायम क्रांति रथ के ड्राइवर हेतराम की चालाकी से बाल-बाल बचे थे जबकि शिवपाल यादव इस हमले में जख्मी हो गए थे।

अयोध्या राम मंदिर विवाद में नाम मिला मुल्ला मुलायम

30 अक्टबूर, 1990 को मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते राम मंदिर के कारसेवकों पर चली गोलियों में पांच लोगों की मौत हुई थी। इस घटना के बाद अयोध्या से लेकर देश का माहौल काफी गरमा गया था। 6 दिसंबर, 1992 में विवादित बाबरी ढांचे को गिरा दिया गया। 1990 के गोलीकांड के बाद हुए उप्र विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह बुरी तरह हार गए और भाजपा के कल्याण सिंह उप्र के नए मुख्यमंत्री बने। तब मुलायम को ‘मुल्ला मुलायम’ तक कहा जाने लगा क्योंकि उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलाने के आदेश दिए थे। मुलायम सिंह ने इसी दौरान समाजवादी पार्टी का गठन भी किया और उन्हें मुस्मिलों का नेता कहा जाने लगा। साल 1990 की घटना के 23 साल बाद जुलाई 2013 में मुलायम ने कहा था कि उन्हें गोली चलवाने का अफसोस है लेकिन उनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं था।

देश का सबसे बड़ा राजनीतिक कुनबा

मुलायम सिंह का परिवार देश का सबसे बड़ा राजनीतिक कुनबा है। इस सबसे बड़े राजनीतिक कुनबे से कुल 13 लोग क्रमश: मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, डिंपल यादव, शिवपाल यादव, राम गोपाल यादव, अंशुल यादव, प्रेमलता यादव, अरविंद यादव, तेज प्रताप सिंह यादव, सरला यादव, अंकुर यादव, धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव राजनीतिक धरातल पर जोर-आजमाइश कर रहे हैं। मुलायम का बड़ा राजनीतिक कुनबा होने के बावजूद उनके एक भाई अभय राम आज भी सादगी भरा जीवन सैफई में रहकर जीते हैं। आज भी वह खेतों में काम करते दिखेंगे। इसी तरह उनके भाई रतन सिंह भी किसानी में रमे थे, लेकिन उनकी हाल ही में मृत्यु हो गई।

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