आखिर क्यों भगवान गणेश ने लिया था ‘महोदर’ अवतार, जानिए इसके पीछे की कहानी

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चैतन्य भारत न्यूज

2 सितंबर से गणेश उत्सव की शुरुआत हो गई है। प्रत्येक घर में गणेश जी के अलग-अलग स्वरूपों की स्थापना की जाती है। बता दें भगवान गणेश के कुल 8 स्वरुप हैं। इनमें से तीसरा स्वरुप ‘महोदर’ है। यह मोहासुर का वध करने वाले हैं तथा मूषक उनका वाहन है। लेकिन भगवान गणेश को क्यों महोदर कहा जाता है? आइए जानते हैं इसके पीछे की कहानी-

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महोदर क्यों बने गणेश

पुराणों में बताया गया कि भगवान गणेश ने महोदर रूप में मोहासुर नाम के राक्षस को पराजित किया था। ये भी दैत्यगुरु शुक्राचार्य का एक शिष्य था। कहा जाता है कि मोहासुर ने अपने तप से सूर्य देव को प्रसन्न किया था और उनसे सर्वत्र विजय का वरदान प्राप्त कर लिया था। इसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने उसे असुरों का राजा घोषित कर दिया। इसके बाद मोहासुर ने  अपने बल से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर आतंक का साम्राज्य स्थापित कर दिया। उसके इसी आतंक का निवारण गणपति ने अपने तीसरे अवतार महोदर बन कर किया था।

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पुराणों के मुताबिक, जब सभी देवी, देवता, ऋषि, मुनि मोहासुर के भय से सूर्य देव की शरण में गए तो उन्होंने श्री गणेश का एकाक्षरी मंत्र दिया और श्री गणेश को प्रसन्न करने के लिए कहा। सभी ने सूर्य देव की बात मान ली और सभी देवी देवताओं ने ऐसा ही किया। इस तपस्या को देखकर भगवन गणेश प्रसन्न हो गए और वे महोदर रूप में प्रकट हुए। देवताओं और मुनियों ने भगवान महोदर से अपने कष्ट का निवारण करने के लिए कहा। भगवान ने उन्हें मोहासुर का वध करने का आश्वासन दिया। इधर नारद मुनि भी मोहासर के पास गए और उसे महोदर की शक्ति का परिचय देते हुए समझदारी से काम लेने को कहा। वहीं दैत्य गुरू शुक्राचार्य ने भी मोहासुर को महोदर की शरण में जाने को कहा।

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इसके अलावा भगवान विष्णु ने भी मोहासुर को समझाया कि तुम महोदर को परास्त नहीं कर सकते अच्छा होगा उनकी शरण में जाओ और उनके मित्र बन जाओ नहीं तो तुम्हारी पराजय और मृत्यु सुनिश्चित है। इन बातों को सुन कर मोहासुर का अहंकार नष्ट हुआ और उसने महोदर को सम्मान सहित अपने नगर में बुला कर उनकी शरण ग्रहण की। इस पर महोदर ने मोहासुर को क्षमा कर जीवन दान दिया और सारे ब्रह्मांड को उसके आतंक से बचा लिया।

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