शहीद कमांडो की बहन की शादी शामिल हुए 100 कमांडो, हथेलियां जमीन पर रखकर किया विदा

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चैतन्य भारत न्यूज

काराकाट/बिहार. चार बहनों के इकलौते भाई ने जब देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी तो उसकी बहन की शादी में भाई की रस्म निभाने के लिए देश के विभिन्न राज्यों से 100 साथी कमांडो पहुंच गए। यह शादी थी शहीद कमांडो ज्योति प्रकाश निराला की बहन शशिकला की। गांव की परंपरा के मुताबिक, साथी कमांडोज ने बहन को अपनी हथेलियों पर लेकर घर से विदा किया।

बिहार के बदिलाडीह में 3 जून को निराला की बहन की शादी पाली रोड के रहने वाले सुजीत कुमार संग हुई। इस शादी में देश की शान वायुसेना के आईएएफ गरुड़ कमांडोज की टीम ने न सिर्फ बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया बल्कि उन्होंने शादी की पूरी जिम्मेदारी भी अपने कन्धों पर ले ली। निराला की शहादत के बाद घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। ऐसे में सभी कमांडोज ने मिलकर बहन की शादी का जिम्मा उठाया। 100 कमांडोज ने पांच लाख रुपए इकट्ठा कर शशिकला की धूमधाम से शादी करवाई। साथ ही उन्होंने शहीद के पिता की आर्थिक मदद भी की। सभी ने दो दिन तक वही रूक कर शादी की सभी तैयारियों का जायजा लिया। शहीद के पिता तेजनारायण सिंह ने कहा कि, ‘यह पल मेरे लिए यादगार बन गया। पूरी शादी में सभी गरुड़ कमांडो ने बेटे की कमी खलने नहीं दी। मैं सबका आभारी हूं।’ उन्होंने यह भी कहा कि, ‘मुझे अफसोस नहीं कि मेरा एक बेटा शहीद हो गया, यहां तो पूरे भारत के कोने-कोने में मेरे ही बेटे हैं।’

इन सभी कमांडोज ने विदाई के समय दुल्हन के पांव जमीन पर नहीं पड़ने दिया। दुल्हन के जहां-जहां पांव पड़ते थे, उससे पहले ही सभी कमांडोज ने अपनी हथेली वहां बिछा दी। इस भावुक पल की कुछ तस्वीर कैमरे में कैद हो गई जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं।

कौन थे ज्योति प्रकाश निराला

18 नवंबर 2017 को जम्मू कश्मीर के बांदीपोरा जिले के चंदरनगर गांव में कुछ आतंकवादियों के छिपे होने की खबर मिली थी। आतंकवादियों के खिलाफ सर्च ऑपरेशन चलाने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय राइफल्स के पास थी। बता दें राष्ट्रीय राइफल्स की टुकड़ी में भारतीय वायुसेना के गरुड़ कमांडोज भी शामिल होते हैं। इस टुकड़ी का नेतृत्व ज्योति प्रकाश निराला कर रहे थे । जिस घर में आतंकवादी छिपे हुए थे उसे जवानों ने चारों ओर से घेर लिया था। फिर जवानों ने आतंकवादियों को आत्मसमर्पण के लिए कहा। इस दौरान आतंकियों ने ताबड़तोड़ गोलियां चला दी। छह आतंकवादी गोली चलाते हुए घर से भागने की कोशिश करने लगे। ऐसे में निराला भी आतंकियों की गोली के निशाने पर आ गए। लेकिन फिर भी निराला ने हार नहीं मानी। उन्होंने आतंकियों पर गोलियों और हथगोलों से हमला किया। घायल होने के बावजूद उन्होंने अकेले ही तीन आतंकियों को मार गिराया और फिर वह शहीद हो गए। इस बहादुरी के लिए गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने निराला को अशोक चक्र से भी सम्मानित किया था।

कौन होते हैं गरुड़ कमांडो

गरुड़ कमांडो वे लोग होते हैं जो दुश्मन को खत्म करके ही सांस लेते हैं। हालात चाहे हवाई हमले के हो या फिर जमीन के वे लोग हर मुसीबत से लड़ने के लिए तैयार रहते हैं। गरुड़ कमांडो को ढाई साल की कड़ी ट्रेनिंग के बाद तैयार किया जाता है। यह ट्रेनिंग इतनी मुश्किल होती है कि आधे लोग कुछ ही महीनों में छोड़कर चले जाते हैं। ट्रेनिंग के दौरान गरुड़ कमांडो को उफनती नदियों और आग के बीच से भी गुजरना पड़ता है। उन्हें बिना सहारे पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है। भारी बोझ उठाकर कई किमी दूर तक दौड़ना और घने जंगलों में से रात में गुजारना भी इनकी ट्रेनिंग का हिस्सा होता है। गरूड़ कमांडो को हवाई क्षेत्र में हमला करने, हवाई आक्रमण करने, स्पेशल रेस्क्यू ऑपरेशन्स के लिए खास तौर पर तैयार किया जाता है। इनके पास कई खतरनाक हथियार होते हैं।

दरअसल, साल 2001 में वायुसेना को ऐसी फाॅर्स की जरुरत महसूस हुई जो हमले, बचाव और कितने भी मुश्किल हालात में दुश्मन को तुरंत जवाब दे सके। अक्टूबर 2002 में इस फाॅर्स को तैयार करने का काम शुरू हुआ और 2004 तक यह फोर्स बनकर तैयार हो गई। पहले इसका नाम ‘टाइगर फोर्स’ रखा गया था लेकिन फिर बाद में इसे ‘गरुड़ फोर्स’ कर दिया गया। जिस तरह से आर्मी के पास पैरा कमांडोज होते हैं, नेवी के पास मारकोज होते हैं, उसी तरह वायुसेना के पास गरुड़ कमांडोज होते हैं। गरुड़ कमांडो का नाम भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के आधार पर रखा गया है।

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