सामान्य ज्योतिष की जानकारी एवं सरल उपाय

लेखक परिचय
पी.पी.एस. चावला

ज्योतिष गणनाएं, राशिफल का करीब तीस साल का अनुभव। 80 के दशक से इस विषय में लेखन कर रहे हैं। आपके लेख  ”प्लेनेट्स एंड फॉरकास्ट” पत्रिका में प्रकाशित होते रहे हैं। इसमें प्रकाशित लेख ज्योतिष में परिवर्तन योग और जन्मस्थ शनि पर गोचरस्थ शनि के संचार का प्रभाव ने अच्छी ख्याति अर्जित की थी।

आप अपने नियमित व्यवहार एवं आसपास के वातावरण में बहुत बदलाव किए बिना भी जीवन में काफी सुधार ला सकते हैं, स्थितियों को अपने अनुकूल बना सकते हैं। इसके लिए प्रस्तुत है कुछ ज्योतिषीय सलाह…

ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक जन्म के समय 9 ग्रहों की स्थिति ही तय करती है कि ये आपको जीवन में किस प्रकार की परिस्थितियों में रखेगी। इसके अलावा यह पूर्व जन्म के संस्कारों, आपके माता-पिता, दादा-दादी, नाना- नानी एवं उत्तरोत्तर उनके भी पूर्वजों के जीवन काल में किए गए कर्मों के आधार पर भी निर्भर होता है।

अगर आपकी कुंडली में कोई ग्रह उच्च राशि में स्थित है तो उसका प्रभाव उच्च होगा। मित्र राशि में होने पर सामान्य शुभ होगा। शत्रु राशि में होने पर सामान्य अशुभ होगा और नीच राशि में होने पर अशुभ होगा।
राशि के अलावा कुंडली में 12 भावों में किस भाव में कौन सा ग्रह स्थित है उसके आधार पर भी उसका फल मिलेगा। शुभ ग्रह केंद्र त्रिकोण इत्यादि में शुभ फल देता है। पाप ग्रह क्रिक स्थान में शुभ फल देता है।

ग्रहः कहां- कैसा फल देता है

सूर्य मेष राशि में उच्च एवं तुला राशि में नीच होता है।
चंद्र वृषभ राशि में उच्च एवं वृश्चिक राशि में नीच होता है।
मंगल मकर राशि में उच्च एवं कर्क राशि में नीच होता है।
बुध कन्या राशि में उच्च एवं मीन राशि में नीच होता है।
गुरु कर्क राशि में उच्च एवं मकर राशि में नीच होता है।
शुक्र मीन राशि में उच्च एवं कन्या राशि में नीच होता है।
शनि तुला राशि में उच्च एवं मेष राशि में नीच होता है।
राहु वृषभ राशि में उच्च एवं वृश्चिक राशि में नीच होता है। मिथुन राशि में भी इसे उच्च माना गया है एवं धनु राशि में नीच समान माना गया है।
केतु वृश्चिक राशि में उच्च एवं वृषभ राशि में नीच होता है।
मिथुन राशि में भी इसे उच्च माना गया है एवं मिथुन राशि में नीच समान माना गया है।

इनमें से अगर उच्चस्थ स्थित ग्रह केंद्र या त्रिकोण में हो तो व्यक्ति अत्यंत ऊंचाई पर पहुंचता है। इसके उदाहरण इस प्रकार हैं…

सूर्य उच्च- श्री श्री रविशंकर, सचिन तेंडुलकर, ब्रायन लारा, एडोल्फ हिटलर
चंद्र उच्च- अरुण जेटली, बाबू जगजीवन राम, सी. राजगोपालाचारी
मंगल उच्च– घनश्यामदास बिरला, सचिन तेंडुलकर,
बुध उच्च– डॉ. एस. राधाकृष्णन, अमिताभ बच्चन, भारतेंदु हरिशचंद्र, अगाथा क्रिस्टी, ई रूज़वेल्ट,
गुरु उच्च– श्री श्री रविशंकर, श्री हरिवंश राय बच्चन, अमिताभ बच्चन, विश्वनाथ प्रताप सिंह, अरविंद महर्षि, अमृता प्रीतम
शुक्र उच्च- एलेक्जेंडर ग्राहम बेल, चैतन्य महाप्रभु
शनि उच्च- एचजी वेल्स, फिदेल कास्त्रो, बिल गेट्स, अटल बिहारी वाजपेयी
राहु उच्च- दादा साहब फालके

सभी ग्रहों का शरीर के विभिन्न अंगों पर एवं व्यक्ति के सांसारिक रिश्तों पर असर होता है। ग्रहों का उच्च और निम्न राशियों में स्थित होना उनसे संबंधित सांसारिक गतिविधियों में उनके पूर्व जन्म के कर्मों पर आधारित होता है।

जिन्होंने राष्ट्र एवं पिता के प्रति आदर रखा है उनकी कुंडली में सूर्य उच्च होगा एवं जिन्होंने अनादर किया होगा उनकी कुंडली में सूर्य नीचस्थ होगा।

जिन्होंने भूमि एवं माता के प्रति आदर रखा है उनकी कुंडली में चंद्र उच्च होगा एवं जिन्होंने अनादर एवं दुष्कर्म किए होंगे उनकी कुंडली में चंद्र नीचस्थ होगा।

जिन्होंने भाइयों एवं मित्रों के प्रति आदर रखा है उनकी कुंडली में मंगल उच्च होगा एवं जिन्होंने अनादर किया होगा उनकी कुंडली में मंगल नीचस्थ होगा।

जिन्होंने बहन, बुआ एवं मौसी के प्रति आदर रखा है उनकी कुंडली में बुध उच्च होगा एवं जिन्होंने अनादर किया होगा उनकी कुंडली में बुध नीचस्थ होगा।

जिन्होंने दादा एवं गुरु के प्रति आदर रखा है उनकी कुंडली में गुरु उच्च होगा एवं जिन्होंने अनादर किया होगा उनकी कुंडली में गुरु नीचस्थ होगा।

जिन्होंने महिलाओं, पति-पत्नी के प्रति आदर रखा है उनकी कुंडली में शुक्र उच्च होगा एवं जिन्होंने अनादर किया होगा उनकी कुंडली में शुक्र नीचस्थ होगा।

जिन्होंने व्यावसायिकता, न्याय, चाचा, ताया के प्रति आदर रखा है उनकी कुंडली में शनि उच्च होगा एवं जिन्होंने अनादर किया होगा उनकी कुंडली में शनि नीचस्थ होगा।

जिन्होंने ससुराल पक्ष के प्रति आदर रखा है उनकी कुंडली में राहु उच्च होगा एवं जिन्होंने अनादर किया होगा उनकी कुंडली में राहु नीचस्थ होगा।

जिन्होंने पुत्र के प्रति स्नेह रखा है उनकी कुंडली में केतु उच्च होगा एवं जिन्होंने अनादर किया होगा उनकी कुंडली में केतु नीचस्थ होगा।

ये मात्र उदाहरण हैं। इस प्रकार से अन्य विषयों में भी किए गए कर्मों के अनुसार ग्रहों का मित्र एवं शत्रु राशियों में पारगमन होता है।

ग्रहों से संबंधित उपाय इस तरह किए जा सकते हैं…

यहां एक बात का ध्यान आवश्यक है कि अगर ग्रह अत्यधिक बिगड़ा हुआ नीचस्थ है या शत्रु राशिस्थ है तो आप कोई भी यज्ञ या हवन इत्यादि करेंगे तो फल तभी मिलेगा जब इसके साथ ही आपकी सोच और संसार के प्रति आपके आचरण में बदलाव आएगा। अगर आपकी सोच वही है और आप हवन इत्यादि करवाएंगे तो फल मिलने लगेगा।

उदाहरण अगर एक उद्योगपति श्रमिक हड़ताल से परेशान है और वह उसका उपाय एक विशाल यज्ञ से करना चाहेगा तो फल तभी मिलेगा, जब वह श्रमिकों के प्रति आत्मीय और स्नेहपूर्वक उनकी समस्याओं का हल करेगा। अगर ऐसा नहीं करता है तो फल नहीं मिलेगा, इसलिए ज्यादा जरूरी यह है कि वह श्रमिकों के साथ बातचीत करके समस्याओं का हल निकाले। यहां यह कहना और समझना आवश्यक है कि इसमें अहम (इगो) को छोड़ना होगा। धर्म एवं अध्यात्म भी अहम छोड़ने की ही बात करते हैं।

रोजमर्रा के उपाय ऐसे उपाय, जिन्हें बगैर उद्देश्य के नियमित अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं तो यह आपकी कुंडली के पूर्व जन्मों पर आधारित दुर्बलताओं को धीरे- धीरे दूर करेगा। “सन्तोषं परमं सुखम ” दूसरा सूत्र है जिसे जीवन का आधार बनाना जरूरी है।

आइए, दैनिक सामान्य उपचार की बात करते हैं-
1. गायत्री मंत्र (ॐ भूर्भुवः स्वः भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न प्रचोदयात ॐ ), हरे कृष्णा मंत्र, (हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॐ ), पांच बार नमाज- (मुस्लिम धर्मावलंबियों के लिए), चर्च में रोशनी करना एवं रोशन होने की प्रार्थना करना (ईसाई धर्मावलंबियों के लिए) अथवा अपने कुटुंब के गुरु द्वारा दिया गया गुरुमंत्र का जाप या और कोई भी विश्वास से किया गया किसी एक ही इष्टदेव के मंत्र का जाप आपकी शक्ति, aura, ऊर्जा इत्यादि को बढ़ाएगा और आपका विश्वास नहीं डगमगाएगा और आपकी कुंडली के सभी दोषों का प्रभाव कम होने लगेगा।

2. माता- पिता के नित्य पैर छूकर आशीर्वाद लें एवं उनका सम्मान करें। जिनके माता-पिता किसी कारणवश साथ नहीं रहते, वे नित्य सूर्य एवं चंद्रमा को प्रणाम करें। इससे आपकी कुंडली में सूर्य एवं चंद्रमा से जुड़े दोषों का प्रभाव कम होने लगेगा। यहां यह भी याद रखें कि यह मात्र सम्मान की बात नहीं है। उनकी आज्ञा का पालन एवं उनके प्रति आदर हमेशा रहना चाहिए।

3. योग्य गुरु की कृपा जिसे प्राप्त हो जाती है उनके जीवन के सारे दोष उसी क्षण समाप्त हो जाते हैं क्योंकि योग्य गुरु दीक्षा के साथ ही अपने शिष्य के सारे दोषों का हरण कर लेते है।
गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
(अर्थात्- गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शंकर है। गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है। उन सद्गुरु को प्रणाम। गुरु की सेवा से गुरु ग्रह से जुड़े दोष स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं)

 4. अपने भाई एवं बहिन से अच्छे संबंध रखें एवं उनका आदर करें। इससे आपका मंगल एवं बुध ग्रह ठीक होना शुरू होगा।

5. इनके अलावा सभी का आदर करना, किसी का दिल न दुखाना कुछ ऐसे सरल उपाय हैं जो हमे बचपन से सिखाए जाते हैं किंतु उम्र के साथ हम सब उनको भूल जाते हैं। यदि हम हमारी बोली में मिठास रखते हैं। किसी का दिल नही दुखाते हैं। सदैव सत्य बोलते हैं, हमारे कर्मो को शुद्ध रखते हैं तो शनि ग्रह एवं अन्य सभी ग्रह ठीक परिणाम देते हैं।

6. रात्रि में समय से सोना एवं सूर्योदय से पूर्व उठना भी एक अचूक उपाय है। यह न केवल राहु- केतु के बुरे प्रभाव को कम करता है अपितु सूर्य, चंद्र, एवं शुक्र को भी मजबूत करता है। सूर्य नमस्कार, पिता का आदर एवं राजा का आदर सूर्य ग्रह के लिए उपाय हैं।

7. आध्यात्मिक पुस्तकों का नियमित अध्ययन पूर्व जन्मों के संचित पापों को समाप्त करता है ।

कुछ व्यक्ति रत्नो के परामर्श भी करते हैं। आइए इनके बारे में जानते हैं…

रत्नों के बारे में सबसे अच्छे पारखी व्यक्ति स्वयं होता है। वे ही समझ सकते हैं कि किसी रत्न ने क्या परिणाम दिया। ध्यान देवें कि कोई भी अच्छा उच्च गुणवत्ता का रत्न 24-48 घंटे में फल देने में समर्थ होता है। अगर इस दौरान फल नहीं मिला तो समझ लें कि रत्न आपके उपयुक्त नहीं है और इसे नहीं पहनना है या फिर रत्न की गुणवत्ता (quality) ठीक नहीं है।

रत्नो से संबंधित एक सामान्य परंतु एक मुख्य जानकारी इस तरह है..

लग्नेश, केंद्रेश, त्रिकोणेश अगर इन्हीं या अन्य शुभ स्थानों में बैठे हैं और मित्र या उच्च राशि में तभी रत्न पहनना है। अगर लग्नेश, केंद्रेश, त्रिकोणेश अगर इन्हीं या अन्य शुभ स्थानों में बैठे हैं और शत्रु या निम्न राशि में स्थित हैं तब नहीं पहनना है।अगर ग्रह उच्च या मित्र राशि में है और छठवें, आठवें या बारहवें स्थान में बैठा है तो रत्न नहीं पहनना है।

उदाहरणः मेष लग्न में मंगल लग्न या दशम, एकादश में बैठा है तब मूंगा पहना जा सकता है यहां मंगल लग्नेश होकर लग्न में स्वराशि मेष में और दशम मकर राशि में उच्च होता है, एकादश में कुंभ राशि में मित्र राशि है और लग्नेश एकादशेश होकर एकादश में स्थित होने से लाभकारी होगा।
यही लग्नेश मंगल अगर चौथे केंद्र स्थान में होगा तो मूंगा नहीं पहना जाएगा क्योंकि मंगल यहां कर्क राशि में नीचस्थ है, अतः ख़राब फल देगा।
ठीक इसी प्रकार मिथुन लग्न में मंगल होने पर शत्रु राशि में मंगल होता है तथा छठवें और 11वें भाव का स्वामी है इसलिए मूंगा पहनने से शारीरिक कष्ट होने की संभावना बनेगी।

मेष लग्न वाले को चंद्र 2,4,5,9 वें स्थान में होने पर मोती, सूर्य पहले, चौथे, नौवें स्थान में होने पर माणिक्य पहनना लाभकारी होगा। यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि अगर शनि की महादशा चल रही हो तो इन्हें नहीं पहनना है। राहु की महादशा में माणिक्य धारण नहीं करना है अपितु मोती पहना जा सकता है।

वृषभ लग्न वाले जातकों के लिए अगर शनि तृतीय, नवम, दशम या एकादश भाव में हो तो नीलम धारण किया जा सकता है।

शनि तृतीय भाव में हो तो अधिकार प्राप्ति में सहायक होता है। अधीनस्थों से सहयोग मिलता है और आसपास के क्षेत्रों से सद्भावना बनी रहती है।

अगर नवम भाव में हो तो भाग्योदय कारक, धार्मिक रूचि बढ़ाने वाला होता है। दशम भाव में राजकीय सफलता और एकादश में लाभकारी एवं वहां सुख चलित संपत्ति में सुखद अनुभवों की प्राप्ति में सहायक रहता है।

शुक्र अगर लग्न, चतुर्थ, नवम, दशम या एकादश भाव में हो तो हीरा धारण किया जा सकता है।

चतुर्थ स्थान में संपत्ति तथा मकान सुख, नवम में भाग्य वृद्धि, दशम में विपरीत योनि के लोगों से लाभ तथा एकादश में ऐश्वर्य प्राप्ति का साधन बनेगा।

बुध अगर पंचम या दशम भाव में हो तो पन्ना धारण किया जा सकता है।
पंचम भाव में सृजन कारक तथा दशम भाव में ख्याति तथा कमीशन एजेंट के कार्य में, पुस्तकों के प्रकाशन तथा शोध में सहायक होगा।

मिथुन लग्न वाले जातकों को लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम इत्यादि में बुध होने पर पन्ना धारण करना शुभ रहेगा।

लग्न चतुर्थ, पंचम में होने पर संवाद, पत्रकारिता, कविता, पुस्तकों के लेखन इत्यादि कार्य में सफलता कारक बनेगा।

गुरु अगर दशम या एकादश में हो तो पुखराज धारण किया जा सकता है जो राजकीय, व्यावसायिक, शैक्षणिक इत्यादि कार्य में सफलता को बढ़ाने में मददगार होगा।

कर्क लग्न वाले जातकों के लिए शुक्र अगर चतुर्थ (सुख सम्पत्ति), नवम (विदेश यात्रा, भाग्योदय कारक) या एकादश भाव में हो तो चल संपत्ति के अर्जन में सहायक होगा।

चद्रमा अगर लग्न, चतुर्थ या नवम एकादश भाव में हो तो मोती धारण करने से मातृ सुख, जल किनारे या जल तत्व की वस्तुओं से लाभ, एकादश में होने से सफेद वस्तुओं से लाभ, कीमती धातुओं से चांदी इत्यादि से लाभ हो सकेगा।

 

(क्रमशः)
(ज्योतिष से जुड़ी अहम जानकारियों की श्रृंखला जारी रहेगी, जुड़े रहिए हमारे साथ)

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