ऐसे हुई गोवर्धन पूजा की शुरुआत, जानिए इसका महत्व और पूजा-विधि

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चैतन्य भारत न्यूज

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन उत्सव मनाया जाता है। हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व है। इस साल गोवर्धन पूजा 28 अक्टूबर को होगी। इस दिन गोवर्धन पर्वत, गोधन यानी गाय और भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है। आइए जानते हैं कैसे हुई गोवर्धन पूजा की शुरुआत, महत्व और इसकी पूजा-विधि।



गोवर्धन पूजा की शुरुआत

मान्यता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलधार बारिश से बचाने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठाकर रखा था तो गोप-गोपिकाएं उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे। सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और हर वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह पर्व अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा।

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गोवर्धन पूजा का महत्व

गोवर्धन पूजा वैसे तो पूरे भारत में ही श्रद्धा के साथ मनाते हैं लेकिन उत्तर भारत में विशेषकर मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, गोकुल, बरसाना आदि जगहों पर इस पर्व की महत्ता अधिक है। मान्यताओं के मुताबिक, यहां स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने गोकुल के लोगों को गोवर्धन पूजा की प्रेरणा दी थी और देवराज इंद्र के अहंकार समाप्त किया था। ऐसा माना जाता है कि इस दिन उनकी पूजा करने से घर में धन, संतान और गौ रस की वृद्धि होती है।

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गोवर्धन पूजा-विधि

  • इस दिन लोग अपने घर के आंगन में गाय के गोबर से एक पर्वत बनाकर उसकी पूजा करते हैं।
  • पूजा के दौरान गोवर्धन पर धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल आदि चढ़ाएं। इसी दिन गाय-बैल और कृषि काम में आने वाले पशुओं की पूजा की जाती है।
  • इसके बाद ब्रज के देवता कहे जाने वाले गिरिराज भगवान को प्रसन्न करने के लिए उन्हें अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।
  • इसके बाद इस पर्वत की परिक्रम लगाई जाती है।
  • गोवर्धन पूजा सुबह या सायंकाल के समय की जाती है।

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