सन्यासी बनकर अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा था बेटा, कोर्ट ने दिया माता-पिता को भत्ता देने का आदेश

sanyasi

चैतन्य भारत न्यूज

अहमदाबाद. कई बार लोग जीवन की मोह-माया से दूर जाकर सन्यासी बनने का फैसला ले लेते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे अपने कर्तव्यों से पीछा छुड़ा लेंगे। यदि कोई सन्यासी बनना भी चाहे तो वह अपने माता-पिता की जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकता है। गुजरात से हाल ही में एक ऐसा ही मामला सामने आया, जिसके बाद कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया।


जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहता था

अहमदाबाद में एक युवक संन्यास लेकर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाना चाहता था। लेकिन माता-पिता ने अपने बेटे के सन्यासी बन जाने पर उसके खिलाफ केस दर्ज करा दिया। इसके बाद संन्यासी बेटे को माता-पिता की जिम्मेदारी लेने का निर्देश देते हुए कोर्ट ने कहा कि, ‘एक बेटे के रूप में अपने माता-पिता की देखरेख उसकी जिम्मेदारी है और वह इस जिम्मेदारी को निभाने से बच नहीं सकता।’ साथ ही कोर्ट ने इस शख्स को अपने माता-पिता को 10 हजार रुपए मासिक गुजारा भत्ता देने का आदेश सुनाया है।

माता-पिता से तोड़ लिए नाते

27 साल के धर्मेश गोल ने प्रतिष्ठित नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ फार्मासूटिकल एजुकेशन ऐंड रिसर्च से फार्मेसी में मास्टर्स डिग्री ली है। पढ़ाई पूरी होने के बाद धर्मेश ने जून 2015 में एक बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी में मिली जॉब को ठुकराते हुए संन्यास ले लिया। वह इस्कॉन की गतिविधियों में सक्रिय हो गए। फिर वह संन्यासी का चोला ओढ़ने लगे और धर्मेश ने अपने पिता लीलाभाई (64) और मां भीखीबेन (55) से सारे नाते तोड़ लिए। जब धर्मेश के बारे में कुछ पता नहीं चला तो परिजनों ने पुलिस से संपर्क किया। बेटे के घर लौटने से इनकार करने के बाद माता-पिता ने अहमदाबाद फैमिली कोर्ट में 50 हजार रुपए के गुजारे भत्ते के लिए याचिका दाखिल की।

पढ़ाई में 35 लाख रुपए खर्च

धर्मेश के माता-पिता ने कहा कि, ‘वे शारीरिक रूप से अक्षम हैं और उनके पास आय का कोई स्रोत नहीं है। उन्होंने अपनी पूरी बचत के पूरे पैसे बेटे की पढ़ाई पर खर्च कर। परिजनों के मुताबिक, उन्होंने धर्मेश की पढ़ाई में 35 लाख रुपए खर्च किए हैं। पढ़ाई पूरी होने के बाद धर्मेश ने 60 हजार रुपए की नौकरी का ऑफर ठुकराकर धार्मिक संगठन से जुड़े एनजीओ के लिए काम करना शुरू कर दिया। वह कई इंस्टिट्यूट्स में लेक्चर देकर संगठन के लिए फंड जुटाने लगे। परिजनों ने बताया कि, धर्मेश एक लाख रुपए महीना कमाते हैं।

10 हजार रुपए मासिक गुजारा भत्ते का आदेश

कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि, ‘धर्मेश ने बिना किसी वजह के अपने माता-पिता को छोड़ दिया। दोनों बुजुर्ग लोग असहाय स्थिति में हैं, क्योंकि बेटे ने उनकी देखरेख के लिए कोई इंतजाम नहीं किया। माता-पिता ने काफी मुश्किल से अपने बच्चे का पालन-पोषण करते हुए उसकी जरूरतों को पूरा किया।’ कोर्ट ने आगे कहा कि, ‘न्याय का यह सिद्धांत है कि बेटे को कमाने के बाद अपने परिजनों की देखभाल करनी चाहिए।’ इसके बाद कोर्ट ने धर्मेश की न्यूनतम मासिक आय 30 से 35 हजार रुपए आंकते हुए माता-पिता को 10 हजार रुपए महीना गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। हालांकि धर्मेश के परिजन 10 हजार के गुजारा भत्ते से संतुष्ट नहीं हैं। उनके पिता का कहना है कि, ‘गुजारा भत्ते की धनराशि में इजाफे के लिए वह हाई कोर्ट में अपील करेंगे।’

ये भी पढ़े…

गलती इंसानों से होती है, कोई जज यह दावा नहीं कर सकता कि उसने कभी गलत फैसला नहीं सुनाया : सुप्रीम कोर्ट

सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- खतरनाक मोड़ पर सोशल मीडिया, सरकार को देना ही चाहिए दखल

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला- शादी के लिए महिलाओं को वर्जिनिटी जाहिर करने की कोई जरुरत नहीं

Related posts