गुरु पूर्णिमा विशेषः आयुर्वेद शिक्षा में अनूठा है गुरु- शिष्य परंपरा का सफर

चैतन्य भारत न्यूज

डॉ. अखलेश भार्गव,
आयुर्वेद विशेषज्ञ,
शासकीय अष्टांग आयुर्वेद कॉलेज, इंदौर (मप्र) 

गुरु-शिष्य परंपरा का प्राचीनतम, पौराणिक एवं वैदिक इतिहास आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली से शुरू हुआ है। सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व ही इसके जीवों के स्वस्थ रहने की मंशा से एवं इस उद्देश्य को लेकर आदि गुरु ब्रह्मा जी द्वारा चिकित्सा व्यवस्था स्थापित की गई। एक लाख श्लोकों की ब्रह्म संहिता का निर्माण किया, जिसमें आयुर्वेद चिकित्सा के मूल रहस्य का वर्णन था। जिस प्रकार सूर्य की तपन एवं प्रकाश का अनुभव उसकी किरणों के द्वारा पृथ्वी पर प्राप्त होता है एवं चंद्रमा की शीतलता का जन-जन को ज्ञान होता है, उसी प्रकार गुरु के द्वारा उपदेशक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने एवं उस ज्ञान को उपयोगी बनाने का कार्य शिष्यों द्वारा संपन्न किए जाते हैं। यदि ज्ञान का अथवा किसी विधा का प्रचार-प्रसार करना है और मनुष्यों को उसका सही लाभ पहुंचाना है तो उसका सबसे सटीक, सरल एवं प्रशस्त मार्ग शिष्य है, अर्थात गुरु शब्द की उत्पत्ति तभी होगी एवं उसका महत्व तब ही होगा जब वह अपने ज्ञान को शिष्य के माध्यम से किसी मार्ग के द्वारा जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

प्राचीन साहित्य में बताया भी गया है कि यदि विज्ञान का प्रयोग उपयुक्त समय पर सही प्रकार से नहीं किया जाता है तो उसमें कमी आती है और वह धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है। किसी भी प्रकार के ज्ञान को कसौटी पर खरा उतरने के लिए अनुसंधान की आवश्यकता होती है और यह अनुसंधान सीमित समय के लिए नहीं, बल्कि अनेक सालों की मेहनत की अपेक्षा करता है। अनुसंधान के द्वारा किसी भी ज्ञान को लोगों को प्रत्यक्ष रूप में पहुंचाने के बाद ही उसका अधिक से अधिक लाभ लिया जा सकता है। जिस प्रकार भगवान सभी जगह नहीं पहुंच सकते, इसलिए उन्होंने माता बनाई। उसी प्रकार एक गुरु सर्वत्र न पहुंचते हुए भी अपने शिष्यों के द्वारा अपने ज्ञान को सभी स्थानों पर पहुंचाने का प्रयास करता है।

प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का अनुसरण करते हुए आयुर्वेद चिकित्सा ज्ञान को ब्रह्मा जी से दक्ष प्रजापति, दक्ष प्रजापति से अश्विनी कुमार, अश्विनी कुमार से देव राज इंद्र ने देव लोक में आयुर्वेद चिकित्सा साहित्य के ज्ञान को भली-भांति अध्ययन किया एवं जन उपयोगी बनाने का प्रयास किया। पृथ्वी पर व्याधियों के उत्पन्न होने पर ऋषि भारद्वाज सर्वप्रथम चिकित्सा ज्ञान प्राप्त करने के लिए देवलोक में इंद्र के पास गए और वहां से यह विद्या लेकर पृथ्वी पर आए। फिर उनसे ज्ञान की परंपरा को आचार्य चरक, आचार्य सुश्रुत एवं अन्य आचार्य ने ज्ञान को लिपिबद्ध करके लोगों तक पहुंचाने का कार्य किया, जिसका लाभ लाखों वर्ष बाद भी हम चिकित्सक लोगों की चिकित्सा करके एवं अनुसंधान करके इस ज्ञान को सतत रूप से आगे आने वाली पीढ़ी को दे रहे हैं। ज्ञान, विज्ञान, संस्कार, परंपरा अनुशासन एवं शिक्षा की एक से दूसरी पीढ़ी में सतत प्रवाह की परंपरा रही है। किंतु इस पंक्ति में वाहक के रूप में अर्थात दो मोतियों को जोड़ने वाले धागे जैसा कार्य गुरु द्वारा ही संपन्न होता है।

एक पीढ़ी में जो व्यक्ति शिष्य के रूप में ज्ञान प्राप्त करता है अगली पीढ़ी में गुरु के रूप में उस ज्ञान को अगली पीढ़ी मे पहुंचाने का कार्य संपन्न करता है । प्रत्येक क्षेत्र में चाहे वह चिकित्सा शिक्षा हो, शिक्षा हो, ज्योतिष और टेक्नोलॉजी हो या राजनीति हो, अब तो समाज का कोई भी वर्ग इससे अछूता नहीं है क्योंकि किसी भी कार्य को प्रशस्त रूप से करने के लिए एक आदर्श व्यक्ति की आवश्यकता होती है, जिसके बताए मार्ग पर चलकर हम उनके ज्ञान को भली-भांति समझ सके एवं उसे सकारात्मक रूप में लेकर आगे की पीढ़ियों में पहुंचा सकें और लोगों को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्राप्ति में इसका सदैव लाभ मिलता रहे। आयुर्वेद शास्त्रों में बताया गया है कि मोक्ष प्राप्ति में जो व्यक्ति हमें अपने कर्तव्य का बोध हमेशा बताता रहता है वहीं गुरु है। एक शिक्षक होना निश्चित रूप से अपने आप में समाज और राष्ट्र के प्रति बड़ी जिम्मेदारी है क्योंकि शिक्षक ही राष्ट्र निर्माता है। किंतु शिक्षक के साथ-साथ एक चिकित्सक होने का समन्वय अपने आप में एक विशेष उपलब्धि तो है ही क्योंकि इसमें छात्र एवं मरीजों दोनों के लिए पुत्रवत व्यवहार की आवश्यकता होती है और अपेक्षा भी। एक छात्र एवं मरीज हमेशा अपने शिक्षक अथवा चिकित्सक से ऐसे ही व्यवहार की अपेक्षा करता है। भारतीय संस्कृति में हमेशा गुरुकुल परंपरा रही है अर्थात गुरु के प्रति समर्पण का भाव। इसी परंपरा ने स्वामी विवेकानंद जैसे आध्यात्मिक गुरुओं को जन्म दिया है। स्पष्ट है कि किसी भी परंपरा का पोषक बनने के लिए अपने गुरु के प्रति समर्पण ही एक मात्र साधन है।

Related posts