गुरु पूर्णिमा विशेषः परंपरा है ज्ञान वहन की प्रक्रिया

चैतन्य भारत न्यूज

डॉ. सतीश चंद शर्मा
प्राचार्य, शासकीय अष्टांग आयुर्वेद कॉलेज, इंदौर (मध्य प्रदेश) 

प्राचीन समय से ही समाज के सभी क्षेत्रों में गुरु-शिष्य परंपरा का अनवरत इतिहास रहा है और इसकी आवश्यकता भी रही है। सभी क्षेत्रों में गुरु-शिष्य परंपरा अर्थात ज्ञान, विद्या, शिक्षा, सम्मान के पोषण की परंपरा उन्नत रही है। जिन क्षेत्रों में गुरु के प्रति सम्मान एवं समर्पण की परंपरा उन्नत रही, उन क्षेत्रों में विकास की परंपरा भी अधिकाधिक रही है क्योंकि किसी भी क्षेत्र में विकास एवं अनुसंधान की प्रथम आवश्यकता गुरु के द्वारा दिया गया उचित सकारात्मक ज्ञान ही है। गुरु-शिष्य परंपरा का वहन भौतिक ना होकर वैचारिक ही माना जाए तो अधिक उपयुक्त रहेगा। किसी भी क्षेत्र के ज्ञान को विकसित करना एवं एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी मे पहुंचाने की महती आवश्यकता है क्योंकि अनेक स्तरों पर समय-समय पर इस ज्ञान के अनुसंधान द्वारा कसौटी पर खरा उतरने के बाद इसको अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है।

एक व्यक्ति अलग- अलग समय पर शिष्य एवं गुरु के कर्तव्यों का वहन करता है, एक समय जब शिष्य बनकर ज्ञान प्राप्त करता है तो उस प्राप्त ज्ञान को अधिक उपयोगी एवं सरल बनाकर अपने छात्रों तक पहुंचाने का प्रयास करता है। प्राचीन समय में आश्रम व्यवस्था की जगह आज बड़े-बड़े इंस्टीट्यूट ने ले ली है। भौतिक रूप से तो इसमें परिवर्तन देख रहे हैं किंतु संस्कार एवं ज्ञान वहन की परंपरा आज भी उसी प्रकार है और उसका आज भी एक ही मार्ग है गुरु के प्रति समर्पण एवं सम्मान। जिन भी छात्रों ने अपने गुरु के प्रति समर्पण एवं कठोर परिश्रम को जीवित रखा है उन्होंने समाज में बड़ा स्थान पाया है। चिकित्सा क्षेत्र निश्चित रूप से सैद्धांतिक तो है ही किंतु व्यवहार एवं प्रयोगात्मक तरीकों का इसमें विशेष महत्व है। एक शिक्षक होने के साथ चिकित्सक होना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है।

प्राचीन संस्थाओं में छात्र एवं मरीज को पुत्रवत संज्ञा दी है, तो इस प्रकार की संज्ञा पर खरा उतरना भी एक चुनौती से कम नहीं है। छात्र को उपयुक्त सकारात्मक शिक्षा देकर समाज के विकास का एक हिस्सा बनाना, एक चिकित्सक के रूप में उसे प्राणचार्य बनाना तथा एक मरीज के प्राण को बचाना, दोनों अपने आप में कौशल का विषय है । प्राचीन साहित्य में गुरु का ईश्वर से भी बड़ा सम्मान एवं स्थान बताया गया है, वह इसलिए कि ईश्वर जन्मदाता है किंतु उस जन्म को सार्थकता देना एक गुरु का कार्य है। आयुर्वेद की चिकित्सा परंपरा भी सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा जी द्वारा बनाई गई है , फिर इस चिकित्सा परंपरा को पौराणिक काल में देवताओं ऋषि- मुनियों और फिर वैद्य द्वारा आधुनिक काल में विकसित एवं अनुसंधान कर आम जनता के प्रयोग में ली जा रही है।

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