चुनाव लड़ने का जज्बा था इस वकील में, पार्षद से लेकर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा, नाम मिला धरती पकड़ 

चैतन्य भारत न्यूज

ग्वालियर. देश में बिहार में विधानसभा और अन्य कई राज्यों में उपचुनाव की सरगर्मी जारी है। राजनीति में आम आदमी से लेकर खास आदमी की रुचि होती है। कुछ लोगों में चुनाव लड़ने का भी शौक होता है। ऐसे ही एक व्यक्ति हुए हैं ग्वालियर के मदनलाल। पेशे से वकील रहे मदनलाल एक जज्बे की वजह से चुनाव लड़ते थे।

यह था चुनावों में धनबल यानी रुपयों का कम से कम खर्च सुनिश्चित करवाना। इसी उद्देश्य के साथ उन्होंने पार्षद से लेकर राष्ट्रपति तक का चुनाव लड़ा, इसलिए उनका नाम ही धरती पकड़ हो गया। वे चुनाव के लिए जमानत राशि का जुगाड़ भी चंदे से करते थे। यही नहीं, प्रचार का पर्चा देने के लिए मतदाताओं से एक रुपया भी लेते थे। धनबल का मुद्दा उठते ही मदनलाल उर्फ धरती पकड़ का चेहरा सामने आ जाता है। इनका चुनाव चिह्न घंटा होता था। उससे वे नेताओं को जागरूक करने का प्रयास करते थे।

ग्वालियर के पुराने लोग बताते हैं कि मदनलाल धरती पकड़ तांगे में बैठकर लंबा टोपा लगाकर प्रचार के लिए निकलते थे। उनके चुनाव लड़ने के उद्देश्य को हालांकि मजाकिया बताकर कभी गंभीरता से नहीं लिया गया लेकिन वे चुनाव लड़ते रहते थे। वे 1962 से 2002 के बीच पार्षद से लेकर राष्ट्रपति तक का चुनाव लड़ चुके थे। वे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, पीवी नरसिम्हाराव व पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया के खिलाफ भी चुनाव लड़ने उनके क्षेत्रों में भी नामांकन दाखिल करने के लिए जाते थे। अपने अंदाज में चुनाव प्रचार कर वे सुर्खियों में भी रहते थे। लोग भले ही उन्हें वोट नहीं देते थे, लेकिन उनके जज्बे का सम्मान अवश्य करते थे। चुनाव खत्म होने के बाद वे कोर्ट में चुनाव में धनबल के बढ़ते उपयोग पर रोक लगाने के लिए याचिका भी दायर करते थे।
मदनलाल धरती पकड़ ग्वालियर के दही मंडी में निवास करते थे। वे सुप्रीम कोर्ट बार में भी रजिस्टर्ड थे, लेकिन कोर्ट कम ही जाते थे। उनके परिवार का ग्वालियर में ही साड़ी व सैनेटरी का कारोबार था। 2003 में उनका निधन हो गया था।

मदनलाल धरती पकड़ के पुत्र हरिदास अग्रवाल ने नईदुनिया को बताया कि पिताजी का उद्देश्य चुनाव जीतना कभी नहीं रहा। वे लोकतंत्र को धनबल के खतरे से आगाह करना चाहते थे। आज उनके विचार प्रासंगिक भी लगते हैं। चुनाव से पहले ही मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री तय हो जाता है। विधायक व सांसद तो जीतने के लिए संगठन की खूंटी से बंध जाते है। पिताजी के चुनावी जुनून से पूरा परिवार डरता था। वे बताते हैं कि एक बार माताजी भोजन कर रही थीं, तभी उन्हें आइसक्रीम वाले की घंटी सुनाई दी। डरकर उन्होंने मुझसे पूछा कि चुनाव आ गए क्या, देख तेरे पिताजी ने चुनाव-चिह्न घंटा तो बाहर नहीं निकाल लिया।

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