घर के मंदिर में बरतें ये सावधानियां

टीम चैतन्य भारत।
भारतीय संस्कृति में घर के मंदिर (पूजा स्थान) का विशेष महत्त्व है। अतेव इस संबंध में भारतीय संस्कृति ने अच्छा दृष्टांत भी दिया है। कहते हैं कि हर जीवात्मा परमात्मा का अंश होती है। प्रभु से सन्निकटता की अनुभूति के लिये योग-ध्यान एवं प्राणायाम की विविध विधियों की रचना हुई, साथ ही भाव जाग्रति के लिए प्राथमिक स्तर के साधकों को मूर्ति उपासना करवाई जाती थी। एक तरह से उन्हें मूर्त से अमूर्त (साकार से निराकार) की ओर आध्यात्मिक प्रवास करवाया जाता था। इस सिलसिले में हर घर चाहे वो छोटा हो या बड़ा एक पूजा स्थान (मंदिर) ज़रूर बनवाया जाता था, ताकि एकाग्रचित्त हो प्रभु का स्मरण किया जा सके। अतेव घर में परमात्मा की साकार मूर्ति स्थापित की जाती थी। घर में मंदिर के होने से सकारात्मक ऊर्जा घर में बनी रहती है, साथ ही घर के सभी सदस्य आस्थावान रहते हैं और उन पर भगवत कृपा बनी रहती है, इससे व्यक्ति आस्थावान रह परमात्मा से संवाद करना सीखता है।

घर में मंदिर बनाने के कुछ अहम् नियम भी बनाये गए जो पंचतत्व, ऊर्जा, पृथ्वी की चुम्बकीय स्थिति, प्रकृति के सार्वभौमिक सिद्धांतों को ध्यान में रख कर बनायी गयी है। इन नियमों का पालन ही वास्तु पालन कहा गया। कई बार पूजा-पाठ के लिए स्थान बनवाते समय जाने-अनजाने में लोगों से छोटी-मोटी वास्तु संबंधी गलतियां हो जाती हैं जिस कारण से घर की शांति और समृद्धि बाधित होती है।

आइये जानते हैं कि वास्तु के अनुसार घर में पूजा-स्थान कहां होना चाहिए और घर के मंदिर को लेकर अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां –

• ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व में पूजा घर

ईशान कोण में मंदिर का स्थान वास्तु में सबसे अच्छा बताया गया है। वास्तु कहता है कि बेशक घर का मुख किसी भी दिशा में हो लेकिन पूजा का स्थान ईशान कोण में ही रखना उत्तम माना जाता है।

• शयनकक्ष या बेडरूम में मंदिर नहीं होना चाहिए

वास्तु बताता है कि मंदिर कभी भी शयनकक्ष या बेडरूम में नहीं बनाना चाहिए। यदि किसी कारणवश घर के शयनकक्ष या बेडरूम में मंदिर बनाना भी पड़े तो मंदिर पर पर्दा जरूर रखें एवं उसे नियम से सुबह खोलें और रात में संध्या पूजन के उपरान्त बंद कर दें।

• इन जगहों पर घर का मंदिर कभी न बनाएं

घर में सीड़ियों के नीचे, शौचालय या बाथरूम के बगल में या बेसमेंट में मंदिर का होना, घर की खुशहाली और समृद्धि के लिए उत्तम नहीं माना जाता है।

• समय निर्धारित करें

नित्य पूजन का समय निर्धारित करें जैसे सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा करें और संध्या के समय सूरज ढल जाने के बाद पूजन करें।

• शास्त्रोक्त ढंग से पूजा करें

पूजन के सामान्य विधि-निषेध का पालन करें। भक्ति भाव के साथ-साथ देव पूजन के नियमों को विद्वान पंडितों से पूछ लें।

• शांत चित्त से पूजा करें

पूजा करते समय हड़बड़ी ना करें, स्वयं को एकाग्र करें। पूजा के पहले थोडा सा कीर्तन करें ताकि आपका मन पूरी तरह प्रभु भक्ति में रम जाए।

• पवित्रता का विशेष ध्यान रखें

तन-मन और पूजा स्थान की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। इससे सम्बंधित आचार नियमों का पालन करें। भाव शुद्धि, अंग शुद्धि, स्थान शुद्धि, प्राणायाम, ध्यान, प्रार्थना, भाव जागृति, गुरु उपासना, गणपति आह्वान, कुलदेवी प्रार्थना, आराध्य निवेदन, यजन-पूजन, मनोकामना निवेदन, क्षमा प्रार्थना का क्रम ध्यान में रखें।

Related posts