किस्सा कुछ यूं हैः केवल सात महीने देश के प्रधानमंत्री रहे थे स्व. चंद्रशेखर, सीधे पहुंच गए थे इस पद पर

चैतन्य भारत न्यूज

लखनऊ. राजनीति संभावनाओं का नाम है और यह कभी भी चौंका सकती है। भारत के प्रधानमंत्री पद को भी कई ऐसी ही चौंका देने वाली हस्तियों ने सुशोभित किया है। इनमें से एक नाम रहा युवा तुर्क कहे जाने वाले स्व. चंद्रशेखर का। वे 10 नवंबर, 1990 से 21 जून, 1991 तक केवल करीब सात महीने 11 दिन तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। वे समाजवादी आंदोलन से निकले नेता थे और प्रधानमंत्री बनने के पहले कभी मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं रहे। उन्हें सीधे प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला।

चंद्रशेखर बड़ी विषम राजनीतिक स्थिति में देश के प्रधानमंत्री बने थे। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की जनता दल सरकार का पतन हो गया। वे 64 सांसदों के साथ जनता दल से अलग हो गए और कांग्रेस के समर्थन से उन्होंने देश में सरकार बना ली। वे प्रधानमंत्री बने लेकिन कांग्रेस के इशारों पर सरकार चलाने से इनकार कर दिया। कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

शुरू से ही बागी प्रवृत्ति के थे चंद्रशेखर

चंद्रशेखर का जन्म 17 अप्रैल 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिम पट्टी में हुआ था। किसान परिवार में जन्म लेने वाले चंद्रशेखर छात्र राजनीति में सक्रिय रहे। एक प्रखर वक्ता, लोकप्रिय राजनेता, विद्वान लेखक चंद्रशेखर अपने तीखे तेवरों और खुलकर बात करने के लिए जाने जाते थे। इन्हीं वजहों से ज्यादातर लोगों की उनसे बनती नहीं थी। वे वर्ष 1951 में सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता बने। यह पार्टी टूटी तो वे कांग्रेस में चले गए। वर्ष 1967 में वे कांग्रेस संसदीय दल के महासचिव बने। वे मूलतः समाजवादी विचारों के थे इसलिए जल्दी ही सत्तासीनों से उनके मतभेद सामने आने लगे। उन्होंने सामाजिक बदलाव लाने वाली नीतियों पर जोर दिया। उन्हें ‘युवा तुर्क’ के नाम से जाना जाने लगा।

उन्होंने वर्ष 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरोध के बावजूद कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति का चुनाव लड़ा और विजय भी हासिल की। सन 1974 में उन्होंने इंदिरा गांधी का विरोध करते हुए लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन का समर्थन कर दिया। वर्ष 1975 में आपातकाल का विरोध किया। परिणामस्वरूप कांग्रेस नेता होने के बावजूद उन्हें जेल में ठूंस दिया गया। यह उनकी कांग्रेस से बगावत का परिणाम था। जेल में रहते हुए उन्होंने जो डायरी लिखी थी, वह बाद में ‘मेरी जेल डायरी’ के नाम से प्रकाशित हुई।

कई दलों में रहे, प्रधानमंत्री भी बने

आपातकाल खत्म होने के बाद विपक्षी दलों की बनाई गई जनता पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए। जब उनकी पार्टी की सरकार बनी तो चंद्रशेखर ने मंत्री पद भी स्वीकार नहीं किया। 1988 तक वे जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे। उन्होंने भारत को जानने के लिए कन्याकुमारी से दिल्ली तक लगभग 4,260 किमी की मैराथन पदयात्रा की थी। यह किसी भी भारतीय नेता द्वारा की गई यह अब तक की सबसे बड़ी पदयात्रा बताई जाती है। इसके बाद वे जनता दल में रहे। समाजवादी जनता दल और समाजवादी जनता पार्टी तक बनाई। उसके सदस्य रहे। चंद्रशेखर के संसदीय जीवन का शुरुआत 1962 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने जाने से हुई। इसके बाद 1984 से 1989 तक के पांच सालों की अवधि छोड़कर वे अपनी आखिरी सांस तक लोकसभा के सदस्य रहे। वे बलिया सीट से ही चुनाव लड़ते थे। 1989 के लोकसभा चुनाव में वे अपने गृहक्षेत्र बलिया के अलावा महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र से भी चुने गए थे। 8 जुलाई 2007 को उनका निधन हुआ।

 

चंद्रशेखर के कार्यकाल में ही देश का सोना गिरवी रखा गया

स्व. चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री रहते ही भुगतान संकट से निपटने के लिए देश का 47 टन सोना विदेश में गिरवी रखा गया था। हालांकि उनके समर्थक मानते हैं कि भूमंडलीकरण की नीतियों के सामने उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया। स्व. चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने छोटे से कार्यकाल में अयोध्या के जटिल होते जा रहे राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मसले को सर्वमान्य हल के करीब तक पहुंचा दिया था। उनके समय में इस विवाद से जुड़े दोनों पक्ष वार्ता की मेजों पर जितने सौहार्द व आपसी समझदारी के साथ आमने-सामने बैठे, उससे पहले या बाद में कभी ऐसा नहीं हुआ। स्व. चंद्रशेखर कहते थे कि अगर हम सारे लोग मन में बैठा लें कि अंततः सबको इसी देश में एक दूसरे का सम्मान करते हुए रहना और उसे आगे बढ़ाना है तो कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसका हल न निकाला जा सके।

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