भारतीय परिप्रेक्ष्य में त्योहारों का मौसम और खानपान से संबंध

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चैतन्य भारत न्यूज

त्योहार और मौसम का बहुत गहरा संबंध होता है। भारतीय प्राचीन समाज में ऋषियों- मनीषियों ने प्रकृति के अनुसार ही सालभर में होने वाले ऋतु परिवर्तन चक्र को समझकर उस दौरान उपवास और उत्सव मनाने की व्यवस्था बनाई है। यदि हम इन पर चिंतन- मनन करें तो पाएंगे कि उत्सव या त्योहार एक तरह से मौसम परिवर्तन की सूचना भी देते हैं। उसे मनाने के तरीके में मौसम से होने वाले प्रतिकूल प्रभावों से शरीर को बचाने का संदेश भी छुपा होता है। भारत में सामान्य रूप से तीन तरह के मौसम (गर्मी, बारिश और ठंड) और 6 ऋतुएं होती हैं-

  • शीत-शरद
  • बसंत
  • हेमंत
  • ग्रीष्म
  • वर्षा
  • शिशिर

भारतीय शास्त्रों के मुताबिक इनमे से तीन ऋतुएं बसंत, ग्रीष्म और वर्षा ‘देवी’ ऋतु कहलाती हैं और शेष शरद, हेमंत और शिशिर ‘पितरों’ की ऋतु कहलाती हैं। भारतीय नववर्ष की शुरुआत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन से होती है। इसे नव- संवत्सर, गुड़ी पड़वा और चेटीचंड भी कहा जाता है। इसी दिन से हिंदू कैलेंडर विक्रम संवत की शुरुआत होती है। उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने इसकी शुरुआत की थी।

चैत्र और वैशाख माह अर्थात अंग्रेजी कैलेंडर का मार्च-अप्रैल होता है, इसी तरह ग्रीष्म ऋतु में ज्येष्ठ और आषाढ़ माह यानी मई-जून का महीना, वर्षा ऋतु में श्रावण और भाद्रपद यानी जुलाई से सितंबर महीना, शरद ऋतु में आश्विन और कार्तिक माह यानी अक्टूबर से नवंबर महीना, हेमंत ऋतु में मार्गशीर्ष और पौष माह यानी दिसंबर से 15 जनवरी तक महीना और शिशिर ऋतु जिसमें माघ और फाल्गुन माह यानी 16 जनवरी से फरवरी के अंत तक का समय आता है।

जिस तरह मौसम के अनुसार प्रकृति में परिवर्तन होता है ठीक उसी तरह हमारे शरीर और मन-मस्तिष्क में भी मौसम के अनुसार ही परिवर्तन होता रहता है।

बदलते मौसम से जुड़े त्योहार और उनमें खानपान-

बसंत ऋतु

हिंदू धर्म के पहले महीने की शुरुआत चैत्र माह से होती है। इस ऋतु में मार्च और अप्रैल का महीना आता है। इस ऋतु में बसंत पंचमी, नवरात्रि, रामनवमी, गुड़ी पड़वा, हनुमान जयंती और गुरु पूर्णिमा जैसे उत्सव मनाए जाते हैं। होली और वसंत पंचमी का त्यौहार मौसम परिवर्तन की सूचना देते हैं। नव-संवत्सर व गुड़ी पड़वा से नए वर्ष की शुरुआत होती है। गुड़ी पड़वा पर खासतौर से पूरन पोली और श्रीखंड जैसे व्यंजन खाए जाते हैं। चूंकि अप्रैल माह से तेज गर्मी की शुरुआत हो जाती है और ऐसे में श्रीखंड हमारे शरीर को ठंडा रखने में मदद करता है। साथ ही इसी दौरान चैत्र नवरात्रि पर्व भी मनाया जाता है। नवरात्रि में देवी के भक्त आराधना में लीन होने के साथ ही नौ दिन का उपवास भी रखते हैं। व्रत रखने से व्यक्ति शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकता है और आने वाले समय में स्वस्थ रहने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

ग्रीष्म ऋतु

ज्येष्ठ और आषाढ़ यानी मई-जून का महीना ‘ग्रीष्म ऋतु’ के अंतर्गत आता है। इसमें सूर्य उत्तरायण की ओर बढ़ता है। इन दोनों ही महीनों में अच्छा भोजन करने के साथ-साथ बीच-बीच में व्रत करने का प्रचलन है। एक नियमित अंतराल में व्रत होते रहें इसलिए इन महीनों में निर्जला एकादशी, वट सावित्री व्रत, शीतला- सप्तमी और अष्टमी, देवशयनी एकादशी और गुरु पूर्णिमा आदि पर्व और त्योहार आते हैं। यानी दोनों ही महीनों में स्वास्थ्य को संतुलित रखने के लिए अच्छा भोजन तो किया ही जाता है साथ ही व्रत भी रखे जाते हैं।

वर्षा ऋतु

वर्षा ऋतु में श्रावण और भाद्रपद यानी जुलाई से सितंबर का महीना आता है। इस माह में हरियाली हो जाने से प्रकृति का सौंदर्य बढ़ जाता है। बारिश के दौरान हमारे जलस्रोत में गंदगी और प्रदूषण बढ़ जाता है इसलिए पूरे सावन माह में उपवास की अच्छी परंपरा है ताकि हम भोजन कम से कम करें और फलाहार आदि ज्यादा करें। इस माह के अंतर्गत सावन सोमवार, रक्षाबंधन और कृष्ण जन्माष्टमी जैसे बड़े त्योहार आते हैं। बारिश के मौसम में खान-पान में सावधानियां बरतना जरूरी होती हैं ताकि खाने- पीने की चीजों से होने वाले संक्रमण से बचा जा सके। जुलाई से सितंबर माह के बीच ज्यादातर त्योहार व्रत रखने वाले ही होते हैं।

शरद ऋतु

आश्विन और कार्तिक अर्थात अक्टूबर से नवंबर का महीना शरद ऋतु के अंतर्गत आता है। यह ऋतु वर्षा के बाद आती है इसलिए वातावरण में सब कुछ धुला, ताजा और स्वच्छ दिखाई देने लगता है। इस ऋतु के त्योहार हैं- श्राद्ध पक्ष, नवरात्रि, दशहरा, करवा चौथ। इस ऋतु में सबसे ज्यादा शारदीय नवरात्रि की धूम रहती है और नवरात्रि के नौ दिन व्रत रखे जाते हैं। यह बदलाव की ऋतु होती है। इसमें न ज्यादा गर्मी होती है और न बहुत ठंड इसलिए  इस दौरान गरिष्ठ भोजन भी किया जा सकता है।

हेमंत ऋ‍तु

इस ऋतु में मार्गशीर्ष और पौष माह अर्थात दिसंबर से 15 जनवरी के बीच का समय आता है। हेमंत ऋतु की शुरुआत शरद पूर्णिमा से होती है। गौरतलब है कि शीत ऋतु को दो भागों में विभाजित किया है- हल्के गुलाबी जाड़े को हेमंत ऋतु कहा जाता है और तीव्र तथा तीखे जाड़े को शिशिर ऋतु कहा जाता है। इस ऋतु में शरीर ज्यादातर स्वस्थ रहता है और पाचन-शक्ति बढ़ जाती है। अतः घी-तेल के बने व्यंजन, काफी समय तक रखे जा सकने वाले व्यंजन बनाए जाते हैं। हेमंत ऋतु में कार्तिक, अगहन और पौष मास आते हैं। कार्तिक मास में करवा चौथ, धनतेरस, रूप चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज आदि तीज-त्योहार आते हैं। दीपावली के समय अनेक प्रकार के व्यंजन खाए जाते हैं लेकिन मौसम की अनुकूलता की वजह से उन्हें आसानी से पचाया जा सकता है और इसका शरीर में कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।

शिशिर ऋतु

इस ऋतु में माघ और फाल्गुन अर्थात 16 जनवरी से फरवरी के अंत तक का महीना होता है। यह ऋतु पतझड़ ऋतु भी कहलाती है क्योंकि इस समय प्रकृति पर बुढ़ापा छा जाता है क्योंकि वृक्षों के पत्ते झड़ने लगते हैं। इस ऋतु के जरिए ही ऋतु चक्र के पूर्ण होने का संकेत मिलना शुरू हो जाता है। इस ऋतु में मकर संक्रांति का त्योहार आता है, जो हिंदू धर्म का बड़ा त्योहार माना जाता है। मकर संक्रांति से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होना शुरू होता है। इस दौरान मूंग की दाल की खिचड़ी अधिक खाई जाती है क्योंकि यह इस मौसम में पौष्टिक होने के साथ-साथ स्वादिष्ट भी होता है। मौसम परिवर्तन के दौरान खिचड़ी शरीर को स्वस्थ रखती है।

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