चंद्रयान-3 : फिर चांद पर जाने की तैयारियों में जुटा ISRO, सरकार से मांगे 75 करोड़

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चैतन्य भारत न्यूज

नई दिल्ली. मिशन ‘चंद्रयान-2’ के असफल हो जाने के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने अगले मिशन ‘चंद्रयान-3’ पर काम करना शुरू कर दिया है। इसरो ने इस मिशन के लिए केंद्र सरकार से 75 करोड़ रुपए की भी मांग की है। हालांकि केंद्र ने पहले ही इसके लिए 75 करोड़ का बजट रखा है। लेकिन यह राशि इसरो के वर्तमान बजट से अलग है जिससे इसरो अपने तीसरे महत्वकांक्षी मून मिशन को अंजाम देगा।



जानकारी के मुताबिक, इसरो के अलग-अलग केंद्रों में इस मिशन पर तेजी से काम चल रहा है। इसके लिए नवंबर 2020 तक की समयसीमा तय की गई है। इस मिशन की मदद से इसरो चंद्रयान-2 के दौरान पूर्वनिर्धारित अपनी खोज प्रक्रिया को जारी रखने की कोशिश करेगा।

कुल 666 करोड़ का बजट

सूत्रों के मुताबिक, 2019-2020 के दौरान इसरो ने सरकार से कुल 666 करोड़ रुपए का बजट मांगा है। इसमें से 11% से ज्यादा सिर्फ चंद्रयान-3 के लिए मांगा गया है। इसके अलावा 666 करोड़ रुपए में से 8.6 करोड़ रुपए साल 2022 के प्रस्तावित ह्यूमन स्पेसफ्लाइट प्रोग्राम, 12 करोड़ स्मॉल सैटलाइट लॉन्च वीइकल और 120 करोड़ लॉन्चपैड के डिवेलपमेंट के लिए मांगे गए हैं। बता दें इसरो ने सबसे ज्यादा मांग यूआर राव सैटलाइट सेंटर और सतीश धवन स्पेस सेंटर के लिए की है। इन दोनों के लिए संस्थान ने 516 करोड़ रुपए मांगे हैं।

नए मिशन में लैंडर और रोवर भेजा जाएगा

चंद्रयान-3 के लिए इसरो ने जो धनराशि की की मांग की है इसमें से 60 करोड़ रुपए मशीनरी, उपकरण और अन्य पूंजीगत काम में खर्च होंगे। इसके अलावा शेष 15 करोड़ रुपए राजस्व व्यय के तहत मांगे गए हैं। बता दें मिशन ‘चंद्रयान-3’ के लिए इसरो ने कई समितियां बनाई हैं। अक्टूबर से लेकर अब तक इन समितियों की तीन उच्च स्तरीय बैठक हो चुकी है। बैठकों में यह तय किया गया कि इस नए मिशन में सिर्फ लैंडर और रोवर को ही भेजा जाएगा। इसमें ऑर्बिटर नहीं होगा क्योंकि इसरो के वैज्ञानिक इसके लिए चंद्रयान-2 के ही ऑर्बिटर का उपयोग करेंगे।

चंद्रयान 2 नहीं कर सका था लैंड

गौरतलब है कि इसी साल सितंबर में इसरो ने चंद्रयान-2 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल पाई। हार्ड लैंडिंग के कारण अचानक ही विक्रम लैंडर से संपर्क टूट गया था। हालांकि ऑर्बिटर ठीक तरह से काम कर रहा है और वैज्ञानिकों का कहना है कि वह सात सालों तक अपना काम करता रहेगा।

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