कारगिल विजय दिवस: कैप्टन सौरभ कालिया थे पहले शहीद, पाक ने निकाल लिए थे आंख-कान, चेहरे पर सिर्फ आईब्रो बाकी थी

caption saurabh kalia kargil

चैतन्य भारत न्यूज

हर वर्ष 26 जुलाई का दिन कारगिल विजय दिवस के रूप मनाया जाता है। साल 2020 में कारगिल विजय दिवस की 21वीं सालगिरह है। भारत और पाकिस्तान के बीच 60 दिनों तक चलने वाले कारगिल युद्ध में कई जवान शहीद हो गए थे। इन्हीं में से एक हैं कैप्टन सौरभ कालिया जो कारगिल युद्ध के पहले शहीद, पहले हीरो हैं। कैप्टन सौरभ कालिया के बलिदान से ही कारगिल युद्ध की शुरुआती इबारत लिखी गई। 22 दिनों तक दुश्मन कैप्टन कालिया को बेहिसाब दर्द देता रहा। पाकिस्तानियों ने कैप्टन कालिया के साथ बेरहमी की सारी हदें पार कर दी थी। उनकी आंखें तक निकाल ली और उन्हें गोली मार दी थीं। महज 22 साल की उम्र में कैप्टन कालिया ने देश के नाम अपनी जान कुर्बान कर दी थी।

पांच जवानों के साथ पेट्रोलिंग पर निकले थे कैप्टन कालिया

दिसंबर 1998 में सौरभ ने आईएमए से ट्रेनिंग ली थी। फिर फरवरी 1999 में उनकी पहली पोस्टिंग कारगिल में 4 जाट रेजीमेंट में हुई थी। 3 मई 1999 को ताशी नामग्याल नाम के एक चरवाहे ने कारगिल की ऊंची चोटियों पर कुछ हथियारबंद पाकिस्तानियों को देखा और फिर उन्होंने इसकी जानकारी भारतीय सेना को आकर दी थी। इसके बाद 14 मई को कैप्टन कालिया पांच जवानों के साथ पेट्रोलिंग पर निकल गए। जब वे बजरंग चोटी पर पहुंचे तो उन्होंने वहां हथियारों से लैस पाकिस्तानी सैनिकों को देखा।

बहादुरों ने पाकिस्तानी सेना का डटकर किया सामना

कैप्टन कालिया की टीम के पास ना तो ज्यादा हथियार थे और ना ही अधिक गोला बारूद। वे सिर्फ पांच जवान और उनके सामने बहुत बड़ी पाकिस्तानी सेना हथियारों से लैस। पाकिस्तानी सेना ने कैप्टन कालिया और उनके साथियों को चारों तरफ से घेर लिया था। कैप्टन कालिया की टीम ने पाकिस्तानियों से जमकर मुकाबला भी किया लेकिन पाकिस्तानियों ने उन्हें बंदी बना लिया। इसके बाद पाकिस्तानियों ने कैप्टन कालिया और उनकी टीम के साथ अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी थी। पाकिस्तानी सेना ने कैप्टन कालिया और उनके पांच सिपाही अर्जुन राम, भीका राम, भंवर लाल बगरिया, मूला राम और नरेश सिंह की हत्या कर दी और भारत को उनके शव सौंप दिए।

आंख-कान सब निकाल लिए थे

कैप्टन कालिया के छोटे भाई वैभव कालिया ने बताया कि, ‘जब हमारे बड़े भाई का शव घर पहुंचा हम बॉडी पहचान तक नहीं कर पा रहे थे। उनके चेहरे पर कुछ बचा ही नहीं था। न आंखें न कान। सिर्फ आईब्रो बची थीं। उनकी आईब्रो मेरी आईब्रो जैसी थीं, इसी से हम उनके शव को पहचान पाए।’

सेना में शामिल होने के 4 महीने में ही कुर्बान की जान

बचपन से ही सौरभ को आर्मी में जाना था। उन्होंने 12वीं के बाद एएफएमसी की परीक्षा दी लेकिन वे पास नहीं कर सके। ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने सीडीएस की परीक्षा दी और उनका सिलेक्शन भी हो गया। सिलेक्शन के बाद डॉक्यूमेंट की वजह से उनकी ज्वाइनिंग में दो-तीन महीने की देर हो गई। उनके पास ट्रेनिंग के लिए अगली बैच में जाने का मौका था, लेकिन उन्होंने देरी के बाद भी उसी बैच में जाने का फैसला लिया। उन्होंने ट्रेनिंग के गैप को हटाने के लिए खूब मेहनत की और दिसंबर 1998 में आईएमए से पास हुए। जब मौत की खबर आई तो बमुश्किल चार महीने ही तो हुए थे सेना ज्वाइन किए।

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