ये हैं कारगिल युद्ध के वो 6 जांबाज, जिनकी शहादत के बारे में नहीं जानता कोई

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चैतन्य भारत न्यूज

26 जुलाई का दिन भारतवासियों के लिए बड़ा ही गौरवशाली है। साल 1999 में इसी दिन हमारे देश के साहसी योद्धाओं ने दुश्मनों को ढेर कर कारगिल युद्ध में जीत हासिल की थी। इसलिए इस दिन को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस खास मौके पर हम आपको उन छह योद्धाओं के बारे में बता रहे हैं, जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया था लेकिन उनके नाम की चर्चा कभी नहीं हुई।

अमरेश पाल

28 जून 1999 को दुश्मनों से लड़ते हुए अमरेश ने अपनी जान कुर्बान कर दी थी। बेलड़ा गांव निवासी अमरेश जिस दिन ड्यूटी पर लौट रहे थे उसी दिन उनकी बेटी का जन्म हुआ था। बेटी का दीदार किए बिना ही वह दुनिया को अलविदा कह गए। अमरेश का एक बेटा और एक बेटी है। उनकी पत्नी उमाकांता जानसठ स्थित गैस एजेंसी का कार्य देखती हैं।

बचन सिंह

12 जून 1999 को लांसनायक बचन सिंह ने कारगिल युद्ध के दौरान बेटले ऑफ तोलोलिंग चोटी पर देश की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दी थी। पचेंडा कलां निवासी बचन सिंह की पत्नी कामेशबाला ने पति के शहीद होने के बाद अपने बेटे हितेश को लेफ्टिनेंट बनाकर पति को सच्ची श्रद्धांजलि दी। जब बचन सिंह शहीद हुए थे तब उनके जुड़वां बेटों हितेश और हेमंत की उम्र साढ़े पांच साल थी। खास बात यह है कि हितेश भी उसी राजपूताना रायफल्स में कमांडिंग अफसर हैं जिस बटालियन में उनके पिता लांसनायक थे।

सतीश कुमार

26 जुलाई 1999 को देश की रक्षा करते हुए सतीश कुमार भारत माता की रक्षा के लिए शहीद हो गए थे। फुलत के रहने वाले सतीश कुमार 238 इंजीनियर रेजीमेंट में थे। उनके पिता धर्मपाल व पूरे गांव को सतीश की शहादत पर फक्र है।

रिजवान त्यागी

3 जुलाई 1999 को ऑपरेशन विजय के दौरान दुश्मन के छक्के छुड़ाते हुए रिजवान त्यागी शहीद हो गए थे। बुढ़ाना में विज्ञाना गांव के निवासी रिजवान 1990 में देश की सेवा करने के लिए सेना में भर्ती हुए थे। परिवार को रिजवान की कमी हमेशा खलती है लेकिन उन्हें अपने बेटे की शहादत पर गर्व है।

नरेंद्र राठी

ऑपरेशन विजय के दौरान दुश्मन के साथ लोहा लेते हुए नरेंद्र राठी भी शहीद हो गए। नरेंद्र देश की सुरक्षा करने के लिए साल 1987 में मेरठ में सेना में भर्ती हुए थे। उनकी मां ने भी अपने कलेजे के टुकड़े को खुशी-खुशी देश की सेवा करने के लिए भेज दिया। 1999 अप्रैल में एक महीने की छुट्टी के बाद नरेंद्र की पोस्टिंग कारगिल की पहाड़ियों पर हो गई और वही लड़ते-लड़ते उन्होंने अपनी जान कुर्बान कर दी।

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