करतारपुर साहिब गुरुद्वारे का क्‍या है इतिहास? जानें बंटवारे से लेकर अब तक की कहानी

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चैतन्य भारत न्यूज

नई दिल्‍ली. भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के नजदीक स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब, करतारपुर (पाकिस्तान) इन दिनों सुर्खियों में बना हुआ है। भारत और पाकिस्तानन के बीच पिछले कई महीनों से तमाम तनाव का माहौल है बावजूद इसके देशवासी करतारपुर जाने के लिए उत्साहित हैं। दरअसल, गुरु नानक देव जी के 550वें जन्मदिन पर यानी 12 नवंबर 2019 से पहले करतारपुर साहिब के लिए बने कॉरिडोर का 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और 9 नवंबर को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान उद्घाटन करेंगे। कॉरिडोर के खुलने के बाद गुरुद्वारा दरबार साहिब में रोजाना 5 हजार भारतीय श्रद्धालु दर्शन के लिए जाएंगे। बाद में यह संख्या बढ़कर 10 हजार प्रतिदिन करने की योजना है।



करतारपुर साहिब गुरुद्वारा क्यों है खास

बता दें करतारपुर स्थित गुरुद्वारा सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी से संबंधित है। करतारपुर साहिब इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि गुरु नानक देव जी ने यहां अपनी आखिरी सांसे ली थी। मान्यता है कि श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारे की नींव श्री गुरु नानक देव जी ने रखी थी। गुरु नानक देव ने करतारपुर में रावी नदी के किनारे स्थित दरबार साहिब गुरुद्वारे में 18 वर्ष बिताए थे। हालांकि, बाद में बाढ़ आने के कारण यह गुरुद्वारा बह गया था जिसके बाद वर्तमान गुरुद्वारा महाराजा रंजीत सिंह ने बनवाया था। यहीं पर उन्होंने ‘किरत करो, नाम जपो, वंड छको’ (नाम जपें, मेहनत करें और बांटकर खाएं) का उपदेश दिया। गुरुद्वारे के अंदर एक कुआं है, जिसके बारे में कहा जाता है कि ये कुआं गुरुनानक देव जी के समय से है और इस कारण कुएं को लेकर श्रद्धालुओं में काफी मान्यता है। गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब की दूसरी मंजिल पर श्री दरबार साहिब स्थित है। वहीं पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी सुशोभित हैं। यहां गुरु नानक देव जी की दो समाधियां हैं। इनमें से एक सिखों और हिंदुओं ने मिलकर बनाई हैं और दूसरी मुस्लिम समुदाय की तरफ से बनाई गई है, जहां वे लोग सजदा करते हैं। इस गुरूद्वारे में दोनों धर्म के लोग ही सेवा करते हैं। गुरूद्वारे में सिख और अन्य धर्म के लोग रूमाला साहिब बांधकर अंदर जाते हैं तो वहीं मुस्लिम टोपी पहन कर दर्शन करते हैं।

बंटवारे से लेकर अब तक कब और क्या हुआ?

  • 1947 में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद सिखों के कई ऐतिहासिक गुरुद्वारे पाकिस्तान की तरफ रह गए थे। इनमें पंजा साहिब, ननकाना साहिब, डेरा साहिब लाहौर और करतारपुर साहिब शामिल हैं।
  • 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर बस यात्रा के दौरान करतारपुर कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा था।
  • 2000 में करतारपुर गुरूद्वारे तक भारतीय सीमा से एक पुल के जरिए सिख श्रद्धालुओं को विज फ्री इंट्री देने पर पाकिस्तान ने सहमति जता दी थी।
  • 2018 में पाकिस्तान में इमरान खान द्वारा प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण के बाद फिर से कॉरिडोर बनाने की कोशिशें तेज हुई। लेकिन पाकिस्तान सरकार के अड़ंगे के कारण अब तक ये कॉरिडोर अटका रहा था।
  • 22 नवंबर 2018 में केंद्रीय कैबिनेट ने करतारपुर कॉरिडोर बनाने को हरी झंडी दी थी।
  • 26 नवंबर में उपराष्ट्रपति वेंकैय्या नायडू ने गुरदासपुर के मन्न गांव में करतारपुर कॉरिडोर का शिलान्यास किया।
  • 28 नवंबर को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने नरोवल में कॉरिडोर का शिलान्यास किया था।
  • 14 मार्च 2019 में दोनों देशों के अधिकारियों की इस मामले को लेकर पहली बैठक हुई। फिर भारत ने खालिस्तान समर्थक गोपाल सिंह चावला और बिशन सिंह के पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में होने पर विरोध जताया।
  • इसके बाद 2 अप्रैल 2019 में भारत के ऐतराज के बाद पाकिस्तान ने गोपाल सिंह चावला और बिशन सिंह को कमेटी से हटा दिया और फिर दूसरी बैठक हुई।
  • 4 सितंबर को करतारपुर कॉरिडोर कैसे काम करेगा? इसे लेकर भारत और पाकिस्तान के अधिकारियों के बीच अटारी में तीसरे दौर की बैठक हुई।
  • अब आखिरकार 9 नवंबर को करतारपुर कॉरिडोर सिख श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाएगा।

दोनों देशों के बीच क्या-क्या समझौते हुए?

  • किसी भी धर्म के भारतीय नागरिक को इस यात्रा के लिए वीजा की जरूरत नहीं होगी।
  • यात्रियों के लिए पासपोर्ट और इलेक्ट्रॉनिक ट्रैवेल ऑथराइजेशन (ईटीए) की जरूरत होगी।
  • यह कॉरिडोर पूरे साल खुला रहेगा।
  • यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं की लिस्ट भारतीय विदेश मंत्रालय 10 दिन पहले ही पाकिस्तान को देगा।
  • इस यात्रा के लिए हर श्रद्धालु को करीब 1400 रुपए देने होंगे।
  • इस यात्रा में एक दिन में पांच हजार लोग दर्शन के लिए जा सकेंगे।
  • फिलहाल इस यात्रा के लिए अस्थाई पुल का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन जल्द ही इसके लिए एक स्थाई पुल बनाया जाएगा।
  • इस यात्रा के लिए श्रद्धालुओं को ऑनलाइन पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करना होगा। गुरुवार से यह पोर्टल शुरु हो चुका है।

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