कस्तूरबा ग्राम: बा के घर में महिलाओं को बनाया जा रहा है सक्षम, हाथों से काटे गए सूत से बने कपड़े पहनती हैं छात्राएं

चैतन्य भारत न्यूज

इंदौर. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की धर्मपत्नी कस्तूरबा गांधी ने 22 फरवरी, 1944 को दुनिया को अलविदा कह दिया था। कस्तूरबा गांधी के स्मृति दिवस पर हम आपको आज इंदौर स्थित ‘बा के घर’ के बारे में बता रहे हैं। कस्तूरबा ग्राम में स्थित बा के घर में रोजाना सैकड़ों छात्राएं प्रार्थना सभा के बाद एक साथ बैठकर सूत काटती हैं। वे अपने हाथों से बने कपड़ें और स्कूल यूनिफार्म पहनती हैं।



कस्तूरबा ग्राम इंदौर के खंडवा रोड पर है। महात्मा गांधी ने 22 फरवरी 1944 को पुणे में पत्नी के निधन के बाद कस्तूरबा गांधी के नाम से एक ट्रस्ट खोलने का निर्णय लिया था। उनकी इच्छा थी कि इस ट्रस्ट को भारत के मध्य में किसी गांव में खोला जाए। फिर 2 अक्टूबर 1945 को महात्मा गांधी के जन्मदिन के अवसर पर कस्तूरबा ग्राम ट्रस्ट का गठन किया गया।बापू खुद इस ट्रस्ट के पहले अध्यक्ष बने। इसके उपाध्यक्ष सरदार पटेल बनाए गए।

इंदौर में कस्तूरबा ग्राम की स्थापना के बाद देश के करीब 23 राज्यों में इसकी 547 शाखाएं संचालित हो रही है। बा के सपने के अनुरूप ही बा के घर में महिलाओं को प्रशिक्षण, सेवा, शिक्षा, स्वरोजगार के माध्यम से सक्षम बनाने काम किया जा रहा है। संस्था के कर्मचारी भी इसमें श्रमदान देते हैं। यह संस्था ग्रामीण, दलित महिलाओं को शिक्षा, सेवा और स्वरोजगार से जोड़ने की दिशा में काम कर रही है। संस्था में करीब 2500 छात्राएं शिक्षा पा रही हैं। कस्तूरबा ग्राम में रोजाना सुबह पहले प्रार्थना होती है और फिर नियमित आधा घंटा सूत काटा जाता है।

कताई विभाग प्रभारी पद्मा मानमोड़े ने बताया कि, कताई विभाग में एक दिन में एक गुंडी और 30 दिन में 30 गुंडी यानी एक किलो के लगभग कपड़ा तैयार हो जाता है। कताई का उद्देश्य पैसा कमाना नहीं बल्कि श्रमदान कर स्वावलंबी बनाना है। बालिकाओं को कताई की ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रस्ट की मंत्री व पूर्व आइएस सूरज डामोर ने बताया कि, अंबर चरखों के जरिए बालिकाएं सूत कातने का काम कर रही हैं। साथ ही यहां इसका कोर्स और ट्रेनिंग भी दी जा रही है। इनका लक्ष्य पुरानी पंरपराएं और नए प्रयोग से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है।

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