जयंती विशेष : रामकृष्ण परमहंस, जिन्होंने विवेकानंद को सिखाए थे जिंदगी के गुर, जानें उनके जीवन से जुड़ी खास बातें

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चैतन्य भारत न्यूज

भारत की 19वीं शताब्दी में श्री रामकृष्ण परमहंस को धार्मिक शख्सियतों में से एक योगी माना जाता है। महान संत, विचारक और स्वामी विवेकानन्द के गुरु रामकृष्ण परमहंस उर्फ गदाधर चटर्जी की आज जयंती है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं रामकृष्ण परमहंस के जीवन से जुड़ी खास बातें।



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  • श्री रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फरवरी, 1836 में बंगाल के हुगली जिले के कमरपुकुर गांव में हुआ था। रामकृष्ण बहुत छोटे ही थे जब उनके पिता का निधन हो गया था। 12 साल की उम्र तक वो स्कूल गए लेकिन शिक्षा व्यवस्था की कमियों के चलते उन्होंने जाना बंद कर दिया। उन्हें पुराण, रामायण, महाभारत और भगवत पुराण का अच्छा ज्ञान था।
  • रामकृष्ण ने अपना ज्यादातर जीवन एक परम भक्त की तरह बिताया। वह काली के भक्त थे। उनके लिए काली कोई देवी नहीं थीं, वह एक जीवित हकीकत थी। रामकृष्ण को प्रकृति से लगाव था, इसलिए वो ज्यादातर समय नदी और झरनों के पास बिताते थे।

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  • रामकृष्ण का मानना था कि हर पुरुष और महिला पवित्र है। उनका कहना था कि परमात्मा को मोक्ष द्वारा नहीं पाया जा सकता, ईश्वर को अपने सही कार्य के माध्यम से पा सकते हैं। मनुष्य के प्रति दयालु होना भगवान के प्रति दयालु माना जाता है। भगवान प्रत्येक मनुष्य के अंदर वास करते हैं। उनकी सोच किसी भी प्रकार से भेदभाव की नहीं थी। वह सभी मनुष्यों को एक समान मानते थे।
  • इनका बाल विवाह शारदामणि से हुआ था, लेकिन इनके मन में स्त्री को लेकर केवल एक माता भक्ति का ही भाव था, इनके मन में सांसारिक जीवन के प्रति कोई उत्साह नहीं था, इसलिए 17 साल की उम्र में ही इन्होने घर छोड़कर स्वयं को मां काली के चरणों में सौंप दिया।

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  • रामकृष्ण के उपदेशों ने शिष्य नरेंद्रनाथ दत्ता जैसे लोगों को बहुत आकर्षित किया। जिन्हें हम स्वामी विवेकानंद के नाम से जानते हैं। स्वामी विवेकानंद ने उनके महान विचारों की ‘रामकृष्ण मिशन’ के नाम से स्थापना की। मिशन को एक गैर-लाभकारी संगठन के रूप में स्थापित किया गया था। जो रामकृष्ण आंदोलन व वेदांत आंदोलन के रूप में जाना जाता है। जो विवेकानंद द्वारा बहुत प्रचारित किया गया था।

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  • अंतिम समय में परमहंस को मुख कैंसर हो गया था जिस कारण उनकी मौत हुई। विवेकानंद ने उन्हें डॉक्टरी ईलाज से ठीक करने की बहुत कोशिश की, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। कहते हैं उन्होंने महासमाधि से प्राण त्यागे थे।

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