जानें महिला अधिकारों की रक्षा करने वाले संबंधित कानून

टीम चैतन्य भारत।

भारतीय समाज में नारी की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है, समाज के लिये नारी आधारभूत नींव से कम नहीं है। उनके त्याग, बलिदान और सर्वस्व समर्पण कर देने की स्वाहुत भावना ने मानव संस्कृति को आगे बढ़ाया है। इस भाव के प्रति सम्मान रखते हुए भारतीय संस्कृति ने निम्न श्लोक के माध्यम से स्त्रियों के प्रति समाज को उचित दृष्टिकोण दिया है।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।

अर्थात जिस घर में स्त्री का सदैव आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं की पूर्ति होती है। उस स्थान, समाज तथा परिवार पर देवतागण सदैव प्रसन्न रहते हैं और वहाँ अपना निवास स्थान बना लेते हैं। लेकिन जिस घर-परिवार या समुदाय में ऐसा नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां देवकृपा कभी नहीं रहती है और वहां संपन्न किये गये कार्य विफल हो जाते हैं।

स्त्रियों को साक्षात् देवी स्वरूपा मानने वाले भारत में कालांतर में जब संस्कारों का अवमूल्यन होने लगा, तब स्त्रियों के प्रति दृष्टि भी विकृत हो गयी। जब समय बदला, स्त्री अपने मृत स्वाभिमान को पुनः जगाकर अपने साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध खड़ी हुई। व्यवस्था परिवर्तन में भागीदारी देते हुए महिलाओं की सुरक्षा हेतु कई सामाजिक और न्यायिक आंदोलनों का सार्थक परिणाम इन कानूनों (धाराओं) के रूप में सामने आया।

आज भारत में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए संविधान में कई कानूनी प्रावधान दिये गए हैं, जिनसे उनके अस्तित्व की गरिमापूर्ण रक्षा हो सके। आइये जानते हैं महिला अधिकारों की रक्षा करने वाले कानून के सम्बन्ध में-

संविधान के अनुच्छेद 14 में कानूनी समानता

1. अनुच्छेद 15 (3) में जाति, धर्म, लिंग एवं जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव न करना।

2. अनुच्छेद 16 (1) में लोक सेवाओं में बिना भेदभाव के अवसर की समानता।

3. अनुच्छेद 19 (1) में समान रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।

4. अनुच्छेद 21 में स्त्री एवं पुरुष दोनों को प्राण एवं दैहिक स्वाधीनता से वंचित न करना।

5. अनुच्छेद 23-24 में शोषण के विरुद्ध अधिकार समान रूप से प्राप्त।

6. अनुच्छेद 25-28 में धार्मिक स्वतंत्रता दोनों को समान रूप से प्रदत्त।

7. अनुच्छेद 29-30 में शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार।

8. अनुच्छेद 32 में संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

9. अनुच्छेद 39 (घ) में पुरुषों एवं स्त्रियों दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन का अधिकार।

10. अनुच्छेद 40 में पंचायती राज्य संस्थाओं में 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से आरक्षण की व्यवस्था।

11. अनुच्छेद 41 में बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और अन्य अनर्ह अभाव की दशाओं में सहायता पाने का अधिकार।

12. अनुच्छेद 42 में महिलाओं हेतु प्रसूति सहायता प्राप्ति की व्यवस्था।

13. अनुच्छेद 47 में पोषाहार, जीवन स्तर एवं लोक स्वास्थ्य में सुधार करना सरकार का दायित्व है।

14. अनुच्छेद 51 (क) (ड) में भारत के सभी लोग ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हों।

15. अनुच्छेद 33 (क) में प्रस्तावित 84वें संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था।

16. अनुच्छेद 332 (क) में प्रस्तावित 84वें संविधान संशोधन के जरिए राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था है।

17.महिलाओं को पुरुषों के समतुल्य कार्य के लिए समान वेतन देने के लिए “समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976” पारित किया गया।

18. शासन ने ‘अंतरराज्यिक प्रवासी कर्मकार अधिनियम’ 1979 पारित करके विशेष नियोजनों में महिला कर्मचारियों के लिए पृथक शौचालय एवं स्नानगृहों की व्यवस्था करना अनिवार्य किया है।

19. इसी प्रकार ‘ठेका श्रम अधिनियम’ 1970’ द्वारा यह प्रावधान रखा गया है कि महिलाओं से एक दिन में मात्र 9 घंटे में ही कार्य लिया जाए।

20. भारतीय दंड संहिता में महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों अर्थात हत्या, आत्महत्या हेतु उकसाना, दहेज मृत्यु, बलात्कार, अपहरण एवं व्यपहरण आदि को रोकने का प्रावधान है। उल्लंघन की स्थिति में गिरफ्तारी एवं न्यायिक दंड व्यवस्था का विधान हैं।

भारतीय दंड संहिता की धारा

1. पीड़िता की खुद से जुड़ी जानकारी और पहचान गोपनीय रखने का अधिकार = धारा 228 A = 2 साल की सज़ा।

2. सार्वजनिक स्थानों पर गंदी गालियाँ देना एवं अश्लील गाने गाना/इशारे करना = धारा 294 = 3 महीने की सज़ा।

3. आत्महत्या करने के लिए उकसाना = धारा 306 = 10 साल की सज़ा।

4. जबरन गर्भ धारण या गर्भपात के लिए मजबूर करना = धारा 312 -315 = 3 से 10 साल की सज़ा।

5. शादी का वादा कर शारीरिक मानसिक शोषण = धारा 493 = 10 साल की सज़ा।

6. गहने, सामान, जमीन नहीं देने पर = धारा 406 = 3 साल की सज़ा।

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