यहां फल और पत्थरों से खेला जाता है युद्ध, उत्तराखंड के देवीधुरा स्थित मंदिर में अनूठी परंपरा

चैतन्य भारत न्यूज

देहरादून. उत्तराखंड के चंपावत जिले में देवीधुरा स्थित मां बाराही देवी के मैदान में फल, फूल और पत्थरों से युद्ध लड़ने की अनूठी परंपरा है। हर साल रक्षाबंधन के दिन इसका आयोजन किया जाता है। इसे  ‘बग्वाल’ कहा जाता है। गुरुवार को हुआ यह युद्ध करीब नौ मिनट चला। इसमें 122 योद्धा मामूली रूप से घायल हो गए।

इसमें भक्त परंपरा के मुताबिक लोग आपस में पत्थरों से लड़ाई करते है। मान्यता है कि मंदिर में नर बलि की परंपरा थी जिसके बाद आधुनिक रूप में यह बग्वाल मेला बन गया। कहा जाता है कि एक आदमी के खून जितना रक्त बहता है तब यह पत्थरों का युद्ध रुकता है। बग्वाल मेला देवीधुरा इलाके में पड़ने वाले गांव के लोग ही खेलते हैं। इसमें वहां रहने वाली जातियां इस पूरे मेले में मिलकर काम करती हैं और इस मेले को सफल बनाती हैं। बग्वाल मेला खेलने वाले लोग ‘द्योका’ कहलाते हैं। इस युद्ध को खेलने के लिए अलग-अलग खाम होते हैं जो गांव की ही अलग-अलग जातियों के लोग होते हैं। इनकी टोलियां ढोल-नगाड़ों के साथ किरंगाल की बनी हुई छतरी जिसे छंतोली कहते हैं, सहित अपने पूरे समूह के साथ मंदिर परिसर में पहुंचते हैं। वहां सभी सर पर कपडा बंधे हाथों में सजा फर्र-छंतोली लेकर मंदिर के सामने परिक्रमा करते हैं।

यहां चार मुख्य खाम हैं जो मैदान में चारों दिशाओं से पत्थर बरसाते हैं। ये चारों खाम गढ़वाल, वालिक, चम्याल तथा लमगड़िया हैं। मंदिर में रखा देवी विग्रह एक पेटी में बंद रहता है। उसी के समक्ष पूजन संपन्न होता है। मान्यता है कि पूजन की वजह से ही इसमें घायल लोग तुरंत ठीक हो जाते हैं। वर्तमान समय में अब पत्थरों के साथ फूल व फल भी फेंके जाते हैं। मां बाराही धाम, उत्तराखंड राज्य में लोहाघाट-हल्द्वानी मार्ग पर लोहाघाट से लगभग 45 किमी की दूरी पर स्थित है। यह स्थान सुमद्रतल से लगभग 6500 फीट ऊंचाई पर स्थित है।

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