विवाह संबंधी परेशानियां दूर करने, मनचाहा पति पाने करें मां कात्यायनी के इन मंत्रों का जाप

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टीम चैतन्य भारत

मां दुर्गा के छठवें रूप का नाम कात्यायनी है। इनकी उपासना नवरात्रि के छठे दिन की जाती है। इस देवी की आराधना करने से भक्तों को आसानी से अर्थ, धर्म, कर्म और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति कात्यायनी देवी ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। कात्यायनी देवी का स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है। दिखने में मां कात्यायनी स्वर्ण के समान चमकीली हैं और इनकी चार भुजाएं हैं। मां कात्यायनी की दाईं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में। इसके अलावा मां का बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में तलवार है तथा नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। कात्यायनी देवी का वाहन सिंह है। कहा जाता है कि गोपियों ने कृष्ण की प्राप्ति के लिए मां कात्यायनी की ही पूजा की थी। मां कात्यायनी की पूजा विवाह संबंधी मामलों के लिए शुभ साबित होती है, विवाह संबंधी परेशानियां दूर होती हैं। साथ ही इनकी उपासना करने से योग्य और मनचाहा पति प्राप्त होता है।

मां कात्यायनी की पूजा विधि-

  •  सबसे पहले चौकी पर माता कात्यायनी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें और फिर इसे गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें।
  •  मां की तस्वीर के साथ ही चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें।
  • इनके अलावा चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका (16 देवी), सप्त घृत मातृका (सात सिंदूर की बिंदी लगाएं) भी स्थापना करें।
  • कात्यायनी देवी की पूजा के दौरान हमेशा पीले अथवा लाल वस्त्र धारण करें।
  •  मां कात्यायनी को पीले फूल और पीला नैवेद्य अर्पित करें। बता दें मां को शहद अर्पित करना शुभ माना जाता है।
  • पूजा के दौरान आसन, अध्र्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि आदि शामिल करें।
  • अंत में मां के मंत्र का जाप करे और इसके बाद पूजन संपन्न करें।

इन मंत्रों से करें मां कात्यायनी की आराधना-

वंदना मंत्र
कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी।
नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः।।

मां कात्यायनी स्त्रोत पाठ
कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

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