मध्यप्रदेश 64वां स्थापना दिवस : जानें देश के हृदय ‘मध्यप्रदेश’ का कैसे हुआ निर्माण

चैतन्य भारत न्यूज

1 नवंबर को मध्यप्रदेश अपना 64वां स्थापना दिवस मना रहा है। इस उपलक्ष्य में पूरे प्रदेश भर में विभिन्न तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। 1 नवंबर 1956 को अस्तित्व में आया मध्यप्रदेश कभी मध्य भारत में आता था। लेकिन बाद में इसे एक राज्य के रूप में पहचान मिली। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर वो क्या कारण था जिसके चलते मध्यप्रदेश अस्तित्व में आया?


 

पहले ऐसा था हमारा मध्यप्रदेश

15 अगस्त , 1947 से पहले देश में कई छोटी-बड़ी रियासतें एवं देशी राज्य अस्तित्व में थे। लेकिन आजादी के बाद उन सभी को स्वतंत्र भारत में मिलाने के लिए एकीकृत किया गया। मध्यभारत प्रांत का गठन 28 मई 1948 को किया गया था। इसमें ग्वालियर और मालवा का क्षेत्र शामिल था। मध्यभारत प्रांत के पहले राजप्रमुख ग्वालियर रियासत के महाराजा जीवाजी राव सिंधिया थें। इस प्रांत की दो राजधानियां थी- पहली ग्वालियर जिसे विंटर राजधानी कहा जाता था और दूसरी इंदौर जिसे ग्रीष्म राजधानी कहा जाता था। मध्यप्रदेश का पुनर्गठन भाषाई आधार पर किया गया। वहीं 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हुआ इसके बाद सन 1951-1952 में देश में पहले आम चुनाव कराए गए। जिसके कारण संसद एवं विधान मंडल कार्यशील हुए। प्रशासन की दृष्टि से इन्हें श्रेणियों में विभाजित किया गया। राज्यों के पुर्नगठन के फलस्वरूप 1 नवंबर, 1956 को मध्य प्रदेश का निर्माण नए राज्य के रूप में हुआ।

भोपाल बनी राजधानी 

डॉ. पटटाभि सीतारामैया मध्यप्रदेश के पहले राज्यपाल थे। जबकि पहले मुख्यमंत्री के रूप में पंडित रविशंकर शुक्ल ने शपथ ली थी। पंडित कुंजी लाल दुबे मध्यप्रदेश के पहले अध्यक्ष बने थे। मध्यप्रदेश के गठन के साथ ही 1 नवंबर 1956 को इसकी राजधानी और विधानसभा का चयन भी कर लिया गया। भोपाल को मध्यप्रदेश की राजधानी के तौर पर चुना गया। कहा जाता है कि भोपाल को राजधानी बनाए जाने के पीछे तात्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. शंकर दयाल शर्मा, भोपाल के आखिरी नवाब हमीदुल्ला खान और पं. जवाहर लाल नेहरू की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

ग्वालियर बनाई जानी थी राजधानी

शुरुआत में ग्वालियर, इंदौर और जबलपुर में से किसी एक को राजधानी बनाने पर विचार किया जा रहा था। वहीं दूसरी ओर भोपाल के नवाब भारत के साथ संबंध ही नहीं रखना चाहते थे। वह हैदराबाद के निजाम के साथ मिलकर भारत का विरोध कर रहे थे। लेकिन केंद्र सरकार यह नहीं चाहती थी कि भारत के हृदय में राष्ट्र विरोधी गतिविधियां बढ़ती जाएं, इसलिए सरदार पटेल ने भोपाल को मध्य प्रदेश की राजधानी बनाने का निर्णय लिया।

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