1 मईः आज ही के दिन अस्तित्व में आए थे महाराष्ट्र और गुजरात

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टीम चैतन्य भारत।

महाराष्ट्र और गुजरात का स्थापना दिवस 1 मई को मनाया जाता है। भारत की आजादी समय समय दोनों राज्यों के ज्यादातर हिस्से मुंबई (तत्कालीन बंबई) राज्य के अंग थे। जब (बंबई) से महाराष्ट्र और गुजरात के गठन का प्रस्ताव आया तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने बंबई को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने की बात कही थी। उनका तर्क था कि अगर मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी बने रहना है तो यह करना आवश्यक है।

स्वतंत्रता के बाद करीब 600 रियासतों में बंटे भारत में राज्यों का पुनर्गठन कम चुनौतीपूर्ण नहीं था। इस काम के लिए 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना। पं. जवाहरलाल नेहरू ने जिस बंबई की बात कही थी, वह द्विभाषी राज्य होता और उसमें गुजराती भाषी सौराष्ट्र तथा कच्छ और मराठी भाषी मराठवाड़ा व नागपुर शामिल था। जबकि बंबई के दक्षिण में स्थित क्षेत्र मैसूर राज्य का हिस्सा था। द्विभाषी राज्य बनाने की वजह केंद्र सरकार का यह डर था कि एक भाषी राज्य देश से अलग होने की मांग कर सकते हैं। हालांकि, बाद में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल का गठन सिर्फ भाषा के आधार पर हुआ।

फरवरी 1956 में मराठी भाषी राज्य के समर्थकों ने पुणे में संयुक्त महाराष्ट्र समिति का गठन किया। इसमें लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी के अनुयायी सदस्य बनाए गए। इस आंदोलन की अगुआई केशव राव झेड़े कर रहे थे। समिति का उद्देश्य संयुक्त महाराष्ट्र का गठन करना था। इसी तरह गुजराती भाषी लोगों ने संयुक्त गुजरात समिति का गठन कर महागुजरात आंदोलन शुरू कर दिया।

डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने भी संयुक्त महाराष्ट्र समिति को समर्थन दे दिया। कांग्रेस इस आंदोलन का विरोध कर रही थी लेकिन तीव्र आंदोलन के बाद वह मराठी व गुजराती भाषी राज्य पर राजी हो गई हालांकि उसने बंबई को महाराष्ट्र से अलग कर केंद्र शासित राज्य बनाने का प्रस्ताव दिया जिस पर समिति राजी नहीं हुई। इसकी एक वजह यह थी कि महागुजरात आंदोलन समिति भी बंबई पर दावा कर रही थी। इस आंदोलन को उस समय तेजी मिली जब नेहरू सरकार के वित्त मंत्री सीडी देशमुख त्यागपत्र देकर आंदोलन से जुड़ गए। इस आंदोलन के दौरान बंबई के फ्लोरा फाउंटेन में अलग राज्य के लिए प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस कार्रवाई की वजह से कई लोगों की जान चली गई। आज इसे हुतात्मा चौक के नाम से जाना जाता है। पूरे आंदोलन के दौरान 106 लोगों ने जान गंवाई।

उधर, अगस्त 1956 में अहमदाबाद के कॉलेज के छात्रों पर लाल दरवाजा पर प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई में आठ छात्रों की मौत के बाद राज्य में आंदोलन तेज हो गया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी इंदुलाल याज्ञनिक ने राजनीति से अपने संन्यास को खत्म कर महागुजरात जनता परिषद का गठन कर आंदोलन का नेतृत्व करना शुरू कर दिया। याज्ञनिक के साथ ही दिनकर मेहता, धनवंत श्राफ जैसे नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। मोरारजी देसाई बंबई स्टेट के विभाजन के पक्ष में नहीं थे और वह एक हफ्ते के उपवास पर चले गए। लोगों ने उनका समर्थन करने की बजाय जनता कर्फ्यू का एलान कर दिया।

बंबई के साथ ही डांग इलाके को लेकर महाराष्ट्र और गुजरात के आंदोलनकारियों के बीच विवाद को गांधीवादी नेता घेलूभाई नायक की मध्यस्थता से सुलझा लिया गया। डांग गुजरात को और मुंबई महाराष्ट्र को देने पर दोनों पक्षों में सहमति बनी। इन दोनों आंदोलनों के परिणामस्वरूप आखिर सरकार को झुकना पड़ा और 1 मई 1960 को महाराष्ट्र और गुजरात के गठन को मंजूरी मिल गई। बताया जाता है कि केंद्र सरकार को इन दोनों राज्यों के गठन के लिए तैयार करने में इंदिरा गांधी की बड़ी भूमिका थी। इंदिरा गांधी उस समय कांग्रेस की अध्यक्ष थीं और उन्होंने ही सरकार व पार्टी को इस मसले पर अपना रुख बदलने के लिए तैयार किया था। इस आंदोलन में हिंसा की वजह से ही मोरारजी देसाई को बंबई का मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था। उनकी जगह यशवंत राव चव्हाण को मुख्यमंत्री बनाया गया था। संयुक्त महाराष्ट्र समिति बेलगाम व करवार को भी महाराष्ट्र में शामिल करने की पक्षधर थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 1 मई 1960 के बाद इस समिति के अधिकांश नेताओं ने त्यागपत्र दे दिया लेकिन समिति के तत्कालीन चेयरमैन भाई उद्धवराव पाटिल ने कर्नाटक में शामिल 862 मराठी भाषी गांवों में महाराष्ट्र को शामिल करने के लिए अपना आंदोलन जारी रखा।

 

 

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