महाशिवरात्रि 2020: हजारों साल पुराने इस मंदिर में साल में एक बार पाषाण शिवलिंग के होते है दर्शन

चैतन्य भारत न्यूज

विदिशा. महाशिवरात्रि के खास अवसर पर चैतन्य भारत न्यूज आपको भगवान शिव के अनोखे मंदिरों के बारे में बता रहा है। इन्हीं में से एक मंदिर है नीलकंठेश्वर महादेव का, जो मध्यप्रदेश के विदिशा जिले की गंजबासौदा तहसील के ग्राम उदयपुर में स्थित है। हजारों साल पुराने इस मंदिर में पांच फीट ऊंचे चबूतरे पर करीब तीन फीट ऊंचा शिवलिंग है। मंदिर की खास बात यह है कि यहां स्थित शिवलिंग पर ढाई सौ साल पहले पीतल का आवरण चढ़ाया गया था। इस आवरण को साल में एक बार महाशिवरात्रि के पर्व पर हटाया जाता है। इसी दिन श्रद्धालु पाषाण शिवलिंग के दर्शन करते हैं।

मध्यकालीन शिल्पकला का अनूठा नमूना यह मंदिर

नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर गंजबासौदा से करीब 16 किमी दूर उदयपुर गांव में स्थित है। मंदिर का निर्माण परमार राजा उदयादित्य ने कराया था। यह मंदिर 10वीं शताब्दी की मध्यकालीन शिल्पकला का अनूठा नमूना है। मंदिर करीब 51 फीट ऊंचा है। मंदिर के चारों तरफ पत्थर की मजबूत दीवारें बनी हुई हैं। मंदिर के बाहर भगवान शिव, दुर्गा, ब्रह्मा, विष्णु और गणेश सहित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थित हैं। मंदिर अपनी कई विशेषताओं के कारण ही पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखता है।

खजुराहो के मंदिरों से होती है मंदिर की तुलना

इतिहासकार गोविंद देवलिया ने बताया कि, एक हजार साल पुराने इस मंदिर में पाषाण से बना शिवलिंग है। 250 साल पहले सिंधिया रियासत द्वारा सूबा प्रमुख खंडेराव अप्पाजी ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। उन्होंने शिवलिंग को सुरक्षित रखने के लिए उस पर पीतल का आवरण भी चढ़ाया था। शिवरात्रि पर आवरण हटाने के बाद ही पाषाण शिवलिंग का जलाभिषेक होता है और अगले दिन यह आवरण पुन: चढ़ाया जाता है। इस मंदिर की तुलना खजुराहो के मंदिरों से की जाती है।

राजा भोज के भतीजे ने कराया था निर्माण

छह पीढ़ियों से पुजारी की भूमिका निभा रहे पंडित महेंद्र कुमार शर्मा ने नीलकंठेश्वर मंदिर के बारे में बताया कि, मंदिर का निर्माण राजा भोज के भतीजे राजा उदयादित्य ने कराया था। मंदिर के आसपास और भी कई छोटे-मोठे मंदिर बनाए गए थे। लेकिन तुर्क हमले के दौरान इन छोटे मंदिरों को नुकसान पहुंचा था।

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