जयंती विशेष: रानी अहिल्याबाई होल्कर जो हाथी की पीठ पर चढ़कर करती थीं युद्ध, पति-पुत्र की मृत्यु के बाद संभाली राज्य की कमान

चैतन्य भारत न्यूज

महान शासक और मालवा प्रांत की महारानी अहिल्याबाई होल्कर की आज जयंती है। रानी अहिल्याबाई होल्कर का जन्म महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के चौड़ी नामक गांव में मनकोजी शिंदे के घर सन 1725 ई में हुआ था। लोग उन्हें राजमाता अहिल्यादेवी होल्कर नाम से भी जानते हैं। उनके पिता मानकोजी शिंदे खुद धनगर समाज से थे, जो गांव के पाटिल की भूमिका निभाते थे।

बचपन से था दया और निष्ठा का भाव

जब गांव में कोई स्त्री-शिक्षा का ख्याल भी मन में नहीं लाता था तब मनकोजी ने अपनी बेटी को घर पर ही पढ़ना-लिखना सिखाया। हालांकि, अहिल्याबाई किसी शाही वंश से नहीं थीं पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। दरअसल, पुणे जाते वक्त उस समय मालवा राज्य के राजा या फिर पेशवा कहें, मल्हार राव होलकर चोंडी गांव में विश्राम के लिए रुके। तभी उनकी नजर आठ साल की अहिल्याबाई पर पड़ी, जो भूखों और गरीबों को खाना खिला रही थीं। इतनी कम उम्र में उस लड़की की दया और निष्ठा को देख मल्हार राव होलकर ने अहिल्या का रिश्ता अपने बेटे खांडेराव होलकर के लिए मांगा।

8 साल की उम्र में बनीं दुल्हन

इस तरह साल 1733 को खांडेराव के साथ विवाह 8 साल की अहिल्या बाई एक दुल्हन के तौर पर मराठा समुदाय के होल्कर राजघराने में पहुंची। लेकिन अहिल्याबाई के ऊपर संकट के बादल तब घिर आए जब साल 1754 में कुंभेर के युद्ध के दौरान उनके पति खांडेराव होलकर वीरगति को प्राप्त हुए। इस समय अहिल्याबाई केवल 21 साल की थीं। अपने पति की मृत्यु के बाद जब अहिल्याबाई ने सती हो जाने का निर्णय किया तो उनके ससुर मल्हार राव होलकर ने उन्हें रोक दिया। हर एक परिस्थिति में अहिल्या के ससुर उनके साथ खड़े रहे।

हाथी की पीठ पर चढ़कर लड़ती थीं

साल 1766 में जब उनके ससुर भी दुनिया को अलविदा कह गए तो उनको अपना राज्य ताश के पत्तों के जैसा बिखरता नजर आ रहा था। ऐसे में अहिल्यादेवी पर जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने अपने ससुर के कहने पर न केवल सैन्य मामलों में बल्कि प्रशासनिक मामलों में भी रुचि दिखाई और प्रभावी तरीके से उन्हें अंजाम दिया। मल्हारराव के निधन के बाद उन्होंने पेशवाओं की गद्दी से आग्रह किया कि उन्हें क्षेत्र की प्रशासनिक बागडोर सौंपी जाए। मंजूरी मिलने के बाद 1766 में रानी अहिल्यादेवी मालवा की शासक बन गईं। उन्होंने तुकोजी होल्कर को सैन्य कमांडर बनाया। उन्हें उनकी राजसी सेना का पूरा सहयोग मिला। अहिल्याबाई ने कई युद्ध का नेतृत्व किया। वे एक साहसी योद्धा थीं और बेहतरीन तीरंदाज। हाथी की पीठ पर चढ़कर लड़ती थीं। हमेशा आक्रमण करने को तत्पर भील और गोंड्स से उन्होंने कई बरसों तक अपने राज्य को सुरक्षित रखा।

बेटे की मौत से महारानी पर टूटा दुखों का पहाड़

रानी अहिल्याबाई अपनी राजधानी महेश्वर ले गईं। वहां उन्होंने 18वीं सदी का बेहतरीन और आलीशान अहिल्या महल बनवाया। राज्य की जिम्मेदारी अहिल्याबाई के नेतृत्व में उनके बेटे मालेराव होलकर ने संभाली। लेकिन विधाता का आखिरी कोप उन पर तब पड़ा जब 5 अप्रैल, 1767 को शासन के कुछ ही दिनों में उनके जवान बेटे की मृत्यु हो गई। कोई भी एक औरत, वह चाहे राजवंशी हो या फिर कोई आम औरत, जिसने अपने पति, पिता समान ससुर और इकलौते बेटे को खो दिया, उसकी स्थिति की कल्पना कर सकता है। पर अपने इस दुख के साये को उन्होंने शासन-व्यवस्था और अपने लोगों के जीवन पर नहीं पड़ने दिया।

30 साल में इंदौर को किया विकसित

उन्होंने शासन-व्यवस्था को अपने हाथ में लेने के लिए पेशवा के समक्ष याचिका दायर की। फिर 11 दिसंबर, 1767 को वे स्वयं इंदौर की शासक बन गईं। हालांकि, राज्य में एक तबका था, जो उनके इस फैसले के विरोध में था पर होलकर सेना उनके समर्थन में खड़ी रही और अपनी रानी के हर फैसले में उनकी ताकत बनी। उनके शासन के एक साल में ही लोगों ने देखा कि कैसे एक बहादुर होलकर रानी अपने राज्य और प्रजा की रक्षा मालवा को लूटने वालों से कर रही है। इंदौर उनके 30 साल के शासन में एक छोटे से गांव से फलते-फूलते शहर में तब्दील हो गया। मालवा में किले, सड़कें बनवाने का श्रेय अहिल्याबाई को ही जाता है।

मंदिरों के निर्माण में पैसा खर्च किया

हिमालय से लेकर दक्षिण भारत के कोने-कोने तक उन्होंने इस पर खूब पैसा खर्च किया। काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारका, बद्रीनारायण, रामेश्वर और जगन्नाथ पुरी के ख्यात मंदिरों में उन्होंने खूब काम करवाए। अहिल्याबाई होल्कर का चमत्कृत कर देने वाले और अलंकृत शासन 1795 में खत्म हुआ, जब उनका निधन हुआ। अहिल्याबाई किसी बड़े राज्य की रानी नहीं थीं, लेकिन अपने राज्य काल में उन्होंने जो कुछ किया वह आश्चर्यचकित करने वाला है।

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