मोबाइल और लैपटॉप की नीली रोशनी आपके दिमाग को कर रही बूढ़ा, कोशिकाओं को हो रहा नुकसान

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चैतन्य भारत न्यूज

वाशिंगटन. मोबाइल, कंप्यूटर और लैपटॉप समेत अन्य दूसरे गैजेट्स लोगों को जल्द बूढ़ा बना रहे हैं। यह हम नहीं कह रहे बल्कि एक शोध में इसका खुलासा हुआ है। गैजेट्स से निकलने वाली नीली रोशनी के संपर्क में आने से दिमाग समय से पहले बूढ़ा हो रहा है। यह शोध अमेरिका के ऑरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया।

कृत्रिम रोशनी जीवनकाल को करती है कम

यह अध्ययन मधुमक्खियों पर हुआ क्योंकि इनकी कोशिकाओं में इंसानों की तरह ही लक्षण दिखाई देते हैं। इसमें खुलासा हुआ है कि गैजेट्स की एलइडी किरणें दिमाग और आंख की कोशिकाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। शोधकर्ताओं का दावा है कि, यह नीली रोशनी सीधे आंख पर नहीं पड़ती है, लेकिन फिर भी यह व्यक्ति को तेजी से बूढ़ा करने का एक कारण बन सकती है। शोध के लेखक और प्रोफेसर जैगा गाइबुल्टॉइकज ने कहा, नीली कृत्रिम रोशनी (Artificial light) जीवनकाल को कम कर देती है। यह जल्द मौत का कारण बन सकती है।

इंसानों पर कम असर

शोधकर्ताओं के मुताबिक, नीली कृत्रिम रोशनी का असर मधुमक्खियों पर देखा गया है, जिसमें उनकी उम्र 15 फीसदी तक कम हो गई। प्रो. जैगा ने कहा कि, इंसानों पर भी इस नीली रोशनी का असर पड़ता होगा, क्योंकि इनकी कोशिकाएं भी कीट पतंगों से मिलती-जुलती हैं। शोध में यह भी पता चला है कि नीली रोशनी दिमाग के न्यूरॉन्स और आंख की कोशिकाओं को डैमेज करती हैं। हालांकि, मधुमक्खियों की तुलना में इंसानों के दिमाग पर इसका असर कम होता है।

प्राकृतिक रोशनी बेहद जरुरी

शोध के मुताबिक, जो लोग नीली एलईडी के संपर्क में रहते हैं, उनके दिमाग की तंत्रिकाएं और रेटिना कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इंसानों और जानवरों के स्वस्थ रहने के लिए प्राकृतिक रोशनी बहुत जरूरी है क्योंकि यह शरीर की जैविक घड़ी को उत्तेजित करती है। इसके अलावा दिमाग की क्रिया बेहतर भी रहती है।

कृत्रिम रोशनी के संपर्क में रहने से कई खतरे

शोध के मुताबिक, ज्यादा समय तक कृत्रिम रोशनी के संपर्क में रहने से कैंसर का खतरा अधिक होता है। यह शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का उत्पादन कम कर देती है। यह हार्मोन शरीर को अपना नींद चक्र बनाए रखने में मदद करता है। नीली रोशनी अन्य हार्मोन को भी नष्ट करती है जिससेे ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर हो सकता है। यह नीली रोशनी त्वचा के अंदर तक जाती है। नाईट शिफ्ट में काम करने वाले लोग इस कृत्रिम रोशनी के संपर्क में अधिक रहते हैं।

चश्मा पहनने से बच सकती हैं आंखें

शोधकर्ताओं के मुताबिक, नीली रोशनी के दुष्प्रभावों से बचने के लिए फोन और लैपटॉप का इस्तेमाल करना तो बंद नहीं किया जा सकता, लेकिन डॉक्टरी सलाह पर चश्मा पहनने से इससे बचाव हो सकता है। दरअसल गैजेट्स का इस्तेमाल करते समय चश्मा पहनने से इसकी रोशनी का सीधा असर आपकी आंखों पर नहीं पड़ता है।

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