मप्र: चंबल नदी के किनारे बसे इस इलाके में पानी बना जहर, लोगों में फैल रहा कैंसर और हो रहे दिव्यांगता का शिकार

nagda cambal river

चैतन्य भारत न्यूज

नागदा. मध्यप्रदेश के उज्जैन से 60 किलोमीटर दूर चंबल नदी के किनारे बसे नागदा शहर को प्रदूषित हवा, पानी और मिट्टी ने जकड़ रखा है। इसके कारण यहां के आसपास के करीब 14 गांवों में हालात बेहद ही खराब है। आलम यह है कि इन गांवों में लोगों में युवावस्था में ही बुढ़ापन आ गया है। किसी की आंखें खराब हो रही हैं तो किसी के अंग बेकार हो रहे हैं। इतना ही नहीं बल्कि कुछ लोग तो कैंसर की चपेट में भी आ चुके हैं।



सबसे ज्यादा हालात चंबल नदी के डाऊन स्ट्रीम पर स्थित परमारखेड़ी गांव में है। केंद्रीय और मध्यप्रदेश प्रदूषण विभाग की टीम परमारखेड़ी गांव पहुंची तो वह लोगों का ऐसा हाल देख हैरान रह गई। जानकारी के मुताबिक, परमारखेड़ी गांव में 177 घर हैं और यहां 48 से ज्यादा लोग दिव्यांग हैं। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि, ‘यहां बच्चे स्वस्थ पैदा होते हैं, लेकिन फैक्ट्रियों द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण के कारण वो दिव्यांग हो गए हैं।’

‘कैंसर कॉलोनी’ के नाम से मशहूर मेहतवास

नागदा के मेहतवास में भी परमारखेड़ी जैसा ही हाल है। यहां के लोगों ने कहा कि, प्रदुषण के कारण उनके इलाके के ज्यादातर लोग कैंसर की चपेट में आ रहे हैं। स्थानीय लोगों ने तो इस जगह का नाम ही ‘कैंसर कॉलोनी’ रख दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, मेहतवास में लगभग 300 परिवार रहते हैं और यहां हर चौथे घर में कैंसर का एक मरीज है। स्वास्थ्य विभाग की साल 2010 की रिपोर्ट में 12 लोगों की मौत सिर्फ कैंसर के कारण होने का खुलासा हुआ था। इसके बाद के वर्षों में कैंसर से और 17 मौतें हो चुकी हैं और कई लोग कैंसर से अभी भी जूझ रहे हैं।

क्या है नागदा में प्रदूषण की वजह

बता दें नागदा नगरी में कई सारे छोटे-बड़े उद्योग हैं। यहां केमिकल प्लांट, विस्कस फाइबर और थर्मल पावर प्लांट के अलावा कई कपड़ा मिल भी हैं। इस शहर में लगभग एक लाख से ज्यादा लोग रहते हैं। यहां ड्रेनेज की कोई अच्छी व्यवस्था नहीं है। इस कारण उद्योगों से निकलने वाला अपशिष्ट सीधा जाकर चंबल नदी या आसपास के खेतों में फैलता है। यही अपशिष्ट अब लोगों के लिए धीमा जहर बन गया है।

बंजर हुई जमीन

इन हालातों पर शोध कर रहे एक वैज्ञानिक ने बताया कि, ‘यह इलाका चंबल नदी के पानी पर आश्रित है इसलिए लोग नदी का पानी पीने और खेती की जमीन पर इस्तेमाल करने लगे। समय के साथ जहरीला पानी जमीन के अंदर भी पहुंचा और जमीन बंजर हो गई। साथ ही फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं भी लोगों की बीमारी की वजह बन रहा है।

पानी में मिले ये केमिकल

2018 में इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी द्वारा की गई एक रिसर्च में बताया गया था कि चंबल के पानी में लेड, नाइट्रेट, फ्लोराइड समेत कई जहरीले तत्व मिले हैं। इसी पानी से खेतों में सिंचाई की गई जिस कारण जमीन की उर्वरक क्षमता प्रभावित हो गई। सूत्रों के मुताबिक, चंबल नदी के डाउन स्ट्रीम के परमारखेड़ी, राजगढ़, अटलावदा, बनवाड़ा, निनावटखेड़ा, जूना नागदा सहित 14 गांव चंबल नदी पर ही निर्भर हैं। यहां पीने के पानी और सिंचाई दोनों के लिए ही एकमात्र स्त्रोत चंबल नदी का पानी है।

मिट्टी पर मिली केमिकल की परत

यहां सिंचाई और पीने के पानी का स्त्रोत भी चंबल ही है, लेकिन औद्योगिक नगरी से निकलने वाले अपशिष्ट ने पानी को प्रदूषित और जमीन को बंजर कर दिया है। वैज्ञानिक बताते हैं कि हमने कई चरणों में पानी की जांच की। हर बार यहां नदी के पानी में पारा, लेड, सीसा, क्रोमियम, जिंक और आर्सेनिक जैसे घातक तत्व बहुत अधिक मात्रा में मिले। साथ ही भूमिगत जल भी प्रदूषित था। खेतों की मिट्टी पर तो केमिकल की परत मिली।

बारिश में कम हुआ नदी में प्रदूषण

नागदा के प्रदूषण पर रिसर्च कर चुके बी.एस बघेल के मुताबिक, शहर के मेहतवास, चामुंडा माता मंदिर, जूना नागदा, गिधघर और परमार खेड़ी गांव से जब पानी के सैंपल लिए गए तो सभी में पाया गया कि बारिश के मौसम में नदी में प्रदूषण कम हुआ था, लेकिन बाकी मौसम में पानी में प्रदूषण फैला रहता है। वहां के पानी में क्लोराइड, सल्फेट, लेड समेत कई जहरीले तत्व पाए गए।

लोगों में फैली ये बीमारियां

जानकारी के मुताबिक, केंद्रीय और मध्यप्रदेश प्रदूषण विभाग की टीम को जब नागदा में प्रदूषण से लोगों के दिव्यांग होने की खबर मिली तो वॉटर रिसोर्स टीम, ग्राउंड वॉटर बोर्ड और केंद्रीय प्रदूषण विभाग की टीम मौके पर पहुंची। फिर उन्होंने परमारखेड़ी में जांच की तो वहां 40 से ज्यादा लोग दिव्यांग मिले। इनमें से किसी की हड्डियां खराब हो गई हैं तो किसी की आंखें खराब हो गई हैं। यहां तक कि कम उम्र के कई लोग भी बूढ़े दिखाई दिए।

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