नर्मदा जयंती : भगवान शिव के पसीने से हुआ था नर्मदा नदी का जन्म, जानिए उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं

चैतन्य भारत न्यूज

आज नर्मदा जयंती है। इस दिन मां नर्मदा की पूजा-अर्चना की जाती है। हर वर्ष माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को नर्मदा जयंती मनाई जाती है। मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी का विस्तार ज्यादा है ऐसे में अमरकंटक में नर्मदा जयंती को पर्व की तरह मनाया जाता है।

जानें नर्मदा से जुड़ीं पौराणिक कथाएं….

कैसे हुई थी उत्पत्ति…

भगवान शंकर लोक कल्याण के लिए तपस्या करने मैकाले पर्वत गए थे, उनके पसीने की बूंदों से इस पर्वत पर एक कुंड का निर्माण हुआ। इसी कुंड में एक बालिका उत्पन्न हुई। जो शांकरी व नर्मदा कहलाई। शिव के आदेशानुसार वह एक नदी के रूप में देश के एक बड़े भूभाग में रव (आवाज) करती हुई प्रवाहित होने लगी। रव करने के कारण इसका एक नाम रेवा भी प्रसिद्ध हुआ। मैकाले पर्वत पर उत्पन्न होने के कारण वह मैकाले सुता भी कहलाई।

पौराणिक कथा के अनुसार, तपस्या में बैठे भगवान शिव के पसीने से नर्मदा प्रकट हुई। नर्मदा ने प्रकट होते ही अपने अलौकिक सौंदर्य से ऐसी चमत्कारी लीलाएं प्रस्तुत की कि खुद शिव-पार्वती चकित रह गए। तभी उन्होंने नामकरण करते हुए कहा- देवी, तुमने हमारे दिल को हर्षित कर दिया। इसलिए तुम्हारा नाम हुआ नर्मदा। नर्म का अर्थ है- सुख और दा का अर्थ है- देने वाली। इसका एक नाम रेवा भी है, लेकिन नर्मदा ही सर्वमान्य है।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, मैखल पर्वत पर भगवान शंकर ने 12 वर्ष की दिव्य कन्या को अवतरित किया महारूपवती होने के कारण विष्णु आदि देवताओं ने इस कन्या का नामकरण नर्मदा किया। इस दिव्य कन्या नर्मदा ने उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर काशी के पंचक्रोशी क्षेत्र में 10,000 दिव्य वर्षों तक तपस्या करके प्रभु शिव से कुछ ऐसे वरदान प्राप्त किए जो कि अन्य किसी नदी के पास नहीं है – जैसे,

  • प्रलय में भी मेरा नाश न हो।
  • मैं विश्व में एकमात्र पाप-नाशिनी नदी के रूप में प्रसिद्ध रहूं।
  • मेरा हर पाषाण (नर्मदेश्वर) शिवलिंग के रूप में बिना प्राण-प्रतिष्ठा के पूजित हो।
  • मेरे (नर्मदा) तट पर शिव-पार्वती सहित सभी देवता निवास करें।

एक कथा ये भी 

चंद्रवंश के राजा हिरण्यतेजा को पितरों को तर्पण करते समय यह अहसास हुआ कि उनके पितृ अतृप्त हैं। उन्होंने भगवान शिव की तपस्या की तथा उनसे वरदान स्वरूप नर्मदा को पृथ्वी पर अवतरित करवाया। भगवान शिव ने माघ शुक्ल सप्तमी पर नर्मदा को लोक कल्याणार्थ पृथ्वी पर जल स्वरूप होकर प्रवाहित रहने का आदेश दिया।

लगभग 1200 किलोमीटर का सफर 

अमरकंटक से प्रकट होकर लगभग 1200 किलोमीटर का सफर तय कर नर्मदा गुजरात के खंभात में अरब सागर में मिलती है।नर्मदा के जल से मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा लाभान्वित है।  विध्यांचल पर्वत श्रेणी से प्रकट होकर देश की ह्रदय स्थली मध्य प्रदेश में यह प्रवाहित होती है।  यह पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है तथा डेल्टाओं का निर्माण नही करती। इसकी कई सहायक नदियां भी हैं।

परिक्रमा भी की जाती है

यह विश्व की एक मात्र ऐसी नदी है, जिसकी परिक्रमा की जाती है क्योंकि इसके हर घाट पर पवित्रता का वास है तथा इसके घाटों पर महर्षि मार्कण्डेय, अगस्त्य, महर्षि कपिल एवं कई ऋषि-मुनियों ने तपस्या की है।

12 ज्योतिर्लिंगों में से एक नर्मदा तट पर

12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ओंकारेश्वर इसके तट पर ही स्थित है। इसके अलावा भृगुक्षेत्र, शंखोद्वार, धूतताप, कोटीश्वर, ब्रह्मतीर्थ, भास्करतीर्थ, गौतमेश्वर। चंद्र द्वारा तपस्या करने के कारण सोमेश्वर तीर्थ आदि 55 तीर्थ भी नर्मदा के विभिन्न घाटों पर स्थित हैं।

Related posts