खत्म हुआ बोडोलैंड विवाद, मोदी सरकार और बोडो संगठनों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर

amit shah, assam

चैतन्य भारत न्यूज

नई दिल्ली. गृहमंत्री अमित शाह, असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल और हिमंता बिश्व शर्मा की मौजूदगी में बोडो शांति समझौते पर हस्ताक्षर हो गए हैं। इस दौरान बोडो आंदोलन से जुड़े सभी बड़े नेता शामिल थे।



इस दौरान अमित शाह ने कहा कि, ‘आज भारत सरकार, असम सरकार और बोडो संगठन के चार समूहों के बीच समझौता हुआ है, ये सुनहरे भविष्य का दस्तावेज है। साल 1987 से ये आंदोलन हिंसक बना, इसमें 2823 नागरिक संघर्ष में मारे गए है, 949 बोडो काडर के लोग और 239 सुरक्षाबल भी मारे गए हैं।’

नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) के सभी गुटों के प्रतिनिधियों के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने को लेकर शाह ने कहा कि, ‘130 हथियारों के साथ 1550 कैडर 30 जनवरी को आत्मसमर्पण करेंगे। गृह मंत्री के तौर पर मैं सभी प्रतिनिधियों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि सभी वादे समयबद्ध तरीके से पूरे होंगे।’ वहीं असम के मंत्री हिमंत बिस्व शर्मा ने कहा, ‘बोडो समाज के सभी हितधारकों ने असम की क्षेत्रीय अखंडता की पुष्टि करते हुए इस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।’

त्रिपक्षीय हुआ समझौता

सोमवार को हुआ समझौता त्रिपक्षीय है। इसमें केंद्र सरकार, असम सरकार और  NDFB के सभी धड़ों का सर्वोच्च नेतृत्व शामिल है। इस समझौते में NDFB के चार धड़े शामिल हो रहे हैं। ये धड़े हैं…

1. NDFB (R) जिसका नेतृत्व रंजन डाइमरी कर रहे हैं।

2. NDFB (Progressive) जिसकी कमान गोविंद बासुमतारी के हाथ में है।

3. धीरेन बोड़ो के नेतृत्व वाली NDFB

4. बी साओरगियरा के नेतृत्व वाली NDFB (S)

क्या है बोडोलैंड मामला?

पूर्वोत्तर में अलग बोडोलैंड की मांग को लेकर 60 के दशक में आंदोलन शुरू हुआ था। बोडो ब्रह्मपुत्र नदी घाटी के उत्तरी हिस्से में बसी असम की सबसे बड़ी जनजाति है। ये जनजाति खुद को असम का मूल निवासी मानते हैं। एक आंकड़े के मुताबिक, असम में बोड़ो जनजाति की आबादी लगभग 28 फीसदी है। बोडो जनजाति की मुख्य शिकायत ये रही है कि असम में इनकी जमीन पर दूसरी संस्कृतियों और अलग पहचान वाले समुदाय ने कब्जा जमा लिया। लिहाजा ये अपने घर में सिकुड़ते चले गए। अलगाववादियों की ओर से भाषा, संस्कृति की मांग और अन्य अधिकारों को लेकर लंबे समय से अलग राज्य की मांग की गई थी।

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