परंपरा न टूटे इसलिए गयाधाम तीर्थ के पंडा खुद कर रहे पिंडदान, यदि एक दिन भी छूट गया तर्पण तो जाग जाएगा गयासुर

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चैतन्य भारत न्यूज

गया. वायुपुराण, गरूड़पुराण व गया महात्म्य जैसे धर्मशास्त्र के अनुसार हर दिन गयाधाम में ‘एक पिंड, एक मुंड’ बेहद जरूरी है। लेकिन इन दिनों कोरोनावायरस लॉकडाउन के कारण सभी लोग अपने-अपने घरों में बंद हैं। देश के तमाम मंदिरों की तरह मोक्षनगरी गया का विष्णुपद मंदिर भी बंद है। अन्य मंदिरों में तो पुजारी भगवान के भोग आदि का काम कर रहे हैं लेकिन विष्णुपद मंदिर में अपने पितरों को मोक्ष दिलाने के लिए यहां पिछले 15 दिनों से काेई भी नहीं आया।

पंडा खुद कर रहे पिंडदान

मान्यता है कि इस मंदिर में रोजाना कम से कम एक मुंड और एक पिंड का तर्पण अनिवार्य है। बता दें मुंड यानी मंदिर के पास श्मशान में एक शवदाह और पिंड यानी मंदिर में किसी एक व्यक्ति द्वारा पिंडदान। ऐसी स्थिति में पिंडदानियों को सुफल देने वाले पंडा खुद पिंडदान कर वर्षों पुरानी इस परंपरा का बखूबी निर्वहन कर रहे हैं। पंडा समाज के मुताबिक, गयासुर को भगवान विष्णु से मिले वरदान के बाद से ही यह परंपरा सनातन काल से चली आ रही है। उनका कहना है कि, जिस दिन गयासुर की यह इच्छा पूरी नहीं हुई तो वह दोबारा प्रकट हो जाएगा।

गयासुर जागे नहीं इसलिए निभा रहे परंपरा

लॉकडाउन के दौरान कारण कोई भी पितरों के तर्पण के लिए कोई आ नहीं रहा। शवदाह करने के लिए भी लोगों को श्मशान तक पहुंचने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। पिंडदान का क्रम टूटे नहीं और गयासुर जागे नहीं, इसलिए पंडा समाज खुद ही 22 अप्रैल से रोजाना पिंडदान कर रहा है। रोजाना पंडा समाज का एक व्यक्ति पिंडदान कर रहा है।

विश्व में शांति व खुशहाली की कामना

आचार्य नवीनचंद्र मिश्र वैदिक ने कहा कि, ‘वायु पुराण के अनुसार वैष्णव भक्त गयासुर के लिए जनकल्याणार्थ मिले वरदान के अनुसार गयाधाम में प्रतिदिन एक मुंड (शवदाह) व पिंड (पिंडदान) अनिवार्य है। विशेष परिस्थिति में ऐसे अवसर का अभाव होता है तो शवदाह की जगह पुतला दहन व पिंड की जगह तीर्थ पुरोहित स्वयं पिंडदान कर परंपरा का निर्वहन करते हैं।’ लॉकडाउन में दैनिक पूजा की तरह गयापाल पिंडदान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि, ‘गयाधाम की महत्ता को कायम रखते हुए पिंड में पितरों की मोक्ष की कामना के साथ कोरोना से जल्द मुक्ति की कामना भी की गई। साथ ही उन्होंने भगवान से आने वाले समय में विश्व में शांति व खुशहाली की कामना भी की है।

गयासुर ने देवताओं से मांगा था यह वरदान

धार्मिक कथाओं के मुताबिक, एक बार गयासुर ने ब्रह्मदेव से यह वरदान मांगा था कि उसका शरीर देवताओं की ही तरह पवित्र हो जाए और उसके दर्शन से लोग पाप मुक्त हो जाएं। इस वरदान के प्राप्त होने के पश्चात स्वर्ग में लोगों की संख्या बढ़ने लगी। देवताओं ने इससे बचने के लिए यज्ञ के लिए गयासुर से यज्ञ की मांग की। फिर गयासुर ने देवताओं को अपना शरीर दे दिया। गयासुर को स्थिर करने के लिए माता धर्मवत्ता शिला को लाया गया, जिसे गयासुर पर रख भगवान विष्णु ने अपने पैरों से दबाया। लेकिन फिर भी गयासुर के मन से लोगों को पाप मुक्त करने की इच्छा नहीं गई। फिर उसने देवताओं से पंचकोशी क्षेत्र में एक पिंड और एक मुंड का वरदान मांगा। कहा जाता है कि जिस दिन यह परंपरा टूटी तो गयासुर पुनः जाग उठेगा।

 

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