यहां लोग खाते हैं चटपटी ‘लाल चींटी की चटनी’, रोगों से बचाने के साथ ही बढ़ाती हैं इम्यूनिटी

चैतन्य भारत न्यूज 

पूरा देश कोरोना वायरस के खिलाफ जंग लड़ रहा है। इस जानलेवा वायरस से बचने के लिए इन दिनों शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। वहीं आदिवासियों की ही इम्यूनिटी की बात करें तो उनका खान-पान और रहन-सहन ही ऐसा है कि उन्हें इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए अलग से कोई प्रयास करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। आदिवासी समुदाय कई प्रकार के कंद मूल, औषधीय गुणों वाली भाजी आदि चीजें खाते हैं जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी रहती है। हालांकि वे लोग इम्युनिटी बढ़ाने के लिए जिस चीज का सेवन करते हैं वो है लाल चींटी की चटनी। इसे स्थानीय भाषा में ‘चापड़ा चटनी’ भी कहते हैं।

चापड़ा चटनी बेचकर अच्छी कमाई कर रहे लोग

यह बात सुनने में जरूर अजीब लगे पर है सच। आदिवासियों का मानना है कि लाल चींटी की चटनी खाने से मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियां नहीं होती हैं और इससे व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। छत्तीसगढ़ और झारखंड के सभी आदिवासी इलाकों में लाल चींटी के औषधीय गुण के कारण चापड़ा चटनी की बहुत मांग हैं। अपने औषधीय गुण के कारण धीरे-धीरे लाल चींटी की चटनी की मांग और बढ़ रही है। लाल चींटियों की चटनी यहां लगने वाले साप्ताहिक बाजारों में दस रुपए में एक दोना के दाम से बेची भी जा रही हैं। स्थानीय आदिवासी इसे स्वयं तो खाते ही हैं साथ ही बाजार में बेचकर अच्छी कमाई भी करते हैं और ये वहां के लोगों में खासी पसंद की जाती है।

कैसे बनाई जाती है चींटी की चटनी

साल वृक्ष के पत्तों में बड़े आकार की लाल चींटियां अपनी लार से एक विशेष प्रकार का घोंसला बनाती हैं। आदिवासी यहां से चींटी निकालने के लिए पहले जमीन पर कपड़ा या एक पॉलीथिन बिछा लेते हैं। फिर जिस टहनी पर चींटी का घोसला होता है उसे काटकर चींटियों को कपड़े या पालिथिन में बंद कर लेते हैं। फिर इन चींटियों और उनके अंडों को पीसा जाता है। फिर उसमे स्वादानुसार मिर्च, नमक, अदरक, लहसुन, मिर्च, धनिया व थोड़ी शक्कर मिलाई जाती है, जिससे इसका स्वाद चटपटा हो जाता है। इसे आदिवासी बड़े चाव से खाते हैं। चींटी में फॉर्मिक एसिड होने के कारण इससे बनी चटनी चटपटी होती है। साथ ही आदिवासियों के लिए यह प्रोटीन का सस्ता स्रोत भी है।

लाल चींटी से ठीक किया जाता है बुखार

लाल चींटी की चटनी को औषधि के रूप में प्रयोग ला रहे आदिवासियों का कहना है कि, चापड़ा को खाने की सीख उन्हें अपनी विरासत से मिली है। यदि किसी को बुखार आ जाए तो उस व्यक्ति को उस स्थान पर बैठाया जाता है जहां लाल चींटियां होती हैं। चींटियां जब पीड़ित व्यक्ति को काटती हैं तो उसका बुखार उतर जाता है।’

चापड़ा चटनी खाने के फायदे 

  • इस चटनी में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, जिंक, कैल्शियम और विटामिन बी-12 होता है।
  • विटामिन बी-12 तंत्रिका तंत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान करता है।
  • चापड़ा चटनी के सेवन से याददाश्त मजबूत होती है।
  • बस्तर के आदिवासी खासतौर पर बुखार, मलेरिया व पीलिया की दवा के रूप में चापड़ा चटनी का सेवन करते हैं।

 

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