10 जनवरी से होगी माघ मेले की शुरुआत, जानें इस समय पवित्र स्नान का महत्व और कैसे होगी मोक्ष की प्राप्ति

चैतन्य भारत न्यूज

प्रयागराज. उत्तरप्रदेश के प्रयागराज में उत्तरा पूर्णिमा से शुरू होकर महाशिवरात्रि तक चलने वाले माघ मेले और माघ स्नान पर्व की शुरुआत इस बार 10 जनवरी 2020 से हो रही है। इसी दिन से 1 महीने के लिए जप, तप, स्नान, ध्यान, दान और व्रत का कल्पवास शुरू हो जाएगा।



इस बार मेले को लेकर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। पुलिस अधीक्षक पूजा यादव ने बताया कि, इस बार के माघ मेले में नाविकों को कड़े निर्देश दिए गए हैं। यात्रियों को लाइफ जैकेट पहनाने के साथ ही कई जगह वन वे की व्यवस्थाएं भी माघ मेले प्रशासन द्वारा की जाएगी। इस मेले की सुरक्षा के लिए करीब 2200 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात रहेंगे। सीसीटीवी हाईटेक, ड्रोन और पहली बार 112 नंबर की बाइक और कार का प्रयोग ही माघ मेले में पुलिस बल द्वारा किया जाएगा।

20-20 बेड के दो चिकित्सालय

जानकारी के मुताबिक, इस बार माघ मेले का क्षेत्रफल लगभग 700 बीघा बढ़ा दिया गया है। यानी कि 2020 में कुल 2560 बीघा जमीन में तंबुओं की नगरी बसाई जाएगी। स्नानार्थियों के लिए इस बार सुविधाएं भी बढ़ाई जा रही हैैं। स्वास्थ्य सेवाओं को ध्यान में रखकर मेले में 20-20 बेड के दो चिकित्सालय, तीन आयुर्वेदिक और तीन होम्योपैथिक चिकित्सालय भी बनाए जा रहे हैं। 10 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किए जा रहे हैैं।

माघ मास का है विशेष महत्व

बता दें सनातन परंपरा में माघ मास का विशेष महत्व है। मान्यता है कि माघ मास में सभी देवी देवता प्रयागराज में ही निवास करते हैं। मकर संक्रांति के मौके पर संगम में स्नान और दान-धर्म का भी विशेष महत्व होता है। इस वजह से माघ मेले में बड़ी संख्या में साधु संत आते हैं और ठंड के वावजूद एक माह तक संगम की रेती पर कठिन तप और साधना करते हैं।

मोक्ष की प्राप्ति

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी ने बताया कि, ‘माघ मास की महिमा का वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने भी राम चरित मानस में किया है। मान्यता है कि माघ मास में एक माह तक संगम में रहकर पूजा-अर्चना और तप-जप करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।’

ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान

लाखों श्रद्धालु हर साल आकर संगम की रेती पर कल्पवास करते हैं। कल्पवासी एक महीने तक संगम की रेती पर बने तम्बुओं में ही रहते हैं। कल्पवासी रोजाना ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा स्नान करते हैं। फिर वे अपने-अपने तम्बुओं में आकर पूजा-अर्चना और भजन कीर्तन करने लगते हैं।

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