अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरे कच्चे तेल के दाम, भारत को होंगे कई फायदे, महंगाई घटेगी, विकास दर बढ़ेगी

crude oil

चैतन्य भारत न्यूज

नई दिल्ली. कच्चा तेल यानी क्रूड ऑयल, जिसे रिफाइन कर पेट्रोल, डीजल और अन्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं, उसके दामों में भारी गिरावट आई है। दरअसल दुनिया के बड़े तेल उत्पादक सऊदी अरब और रूस के बीच कच्चे तेल को लेकर प्राइस वॉर चल रहा था। इसी बीच कच्चे तेल की कीमतें पिछले 30 साल के सबसे निचले स्तर पर जा पहुंची। जानकारों का कहना है कि सऊदी अरब और रूस की इस लड़ाई में भारत को बड़ा फायदा होगा।



जानकारों के मुताबिक, भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरत का 80-85 हिस्सा आयात करता है। यदि कच्चे तेल के दाम में 1 डॉलर की गिरावट होती है तो सालाना इससे भारत 10000 करोड़ रुपए बचा सकता है। ऐसे में भारत की धीमी होती अर्थव्यवस्था में सुधार होगा। महंगाई कम होगी। इंपोर्ट बिल घटने से जो बचत होगी, उसे सीधे ग्राहकों तक पहुंचाया जा सकता है और ऐसे में कम सब्सिडी से सरकार के बजट को मदद मिलेगी। डॉलर के मुकाबले रुपए में भी मजबूती आएगी। पेट्रोल और डीजल के दाम में 15 रुपए प्रति लीटर या उससे भी ज्यादा की कमी हो सकती है।

जानकारी के मुताबिक, भारत की क्रूड ऑयल बास्केट की कीमत 47.92 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। फिलहाल भारत एक क्रूड बास्केट के लिए 3500 रुपए से 3600 रुपए तक खर्च कर रहा है। सऊदी अरब के फैसले के बाद यदि क्रूड ऑयल की कीमत में 50 फीसदी तक कटौती होती है तो इसका बड़ा फायदा आम आदमी को होगा।

ऐसे होगा लाभ

जब भी किसी चीज की डिमांड कम होती है और सप्लाई ज्यादा तो उसके दाम गिर जाते हैं। यही बात कच्चे तेल की कीमतों में भी लागू होती है। आंकड़ों के मुताबिक, भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरत का 80-85 हिस्सा आयात करता है। यदि इसके दाम कम हुए तो सरकारी खर्च या आयात पर होने वाले खर्च में राहत मिलेगी। कम खर्च होने पर भारत सरकार की बचत भी ज्यादा होगी। ऐसे में आम आदमी को भी महंगाई से राहत मिल सकती है।

रूस और सउदी में प्राइस वॉर

रूस और सउदी में प्राइस वॉर शुरू होने की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। जानकारों की माने तो सऊदी अरब के नेतृत्व में ओपेक ने क्रूड ऑयल प्रोडक्शन कम करने का प्रस्ताव दिया था। इसे रूस की सहमति के लिए भेजा गया था, लेकिन रूस ने प्रोडक्शन कम करने से इनकार कर दिया। इसके बाद दोनों देशों के बीच प्राइस वॉर शुरू हो गया और इसका असर दुनियाभर के बाजारों में देखने को मिल रहा है।

 

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